संघर्ष से शिखर तक : भारतीय महिला क्रिकेट की असली कहानी
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की आज की चमक-दमक और आर्थिक स्थिरता के पीछे संघर्षों से भरा एक लंबा सफर छिपा है। आज जहां खिलाड़ियों को बीसीसीआई से बराबर मैच फीस मिलती है, आईसीसी की प्राइज मनी में समानता आई है, और टीम फाइव स्टार होटलों में ठहरती है, एक दौर ऐसा भी था जब 20 खिलाड़ियों के लिए सिर्फ चार टॉयलेट होते थे, डॉरमेट्री के फर्श पर सोना पड़ता था और दाल प्लास्टिक के बर्तनों में परोसी जाती थी।
भारतीय महिला क्रिकेट की शुरुआत अभावों में हुई, लेकिन जुनून और देशप्रेम से भरी महिलाओं ने इसे नई ऊँचाइयों तक पहुंचाया। उन्हीं में से एक थीं नूतन गावस्कर, महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर की छोटी बहन।
वर्ष 1973 में वे भारत में महिला क्रिकेट आंदोलन की अग्रदूतों में थीं। उसी साल भारतीय महिला क्रिकेट संघ की स्थापना हुई, जिसने 2006 तक राष्ट्रीय टीम का संचालन किया। उसके बाद बीसीसीआई ने महिला क्रिकेट को अपने अंतर्गत लिया। नूतन गावस्कर बताती हैं कि तब पैसा नहीं था, पर खेल के प्रति प्रेम अटूट था।

उन्होंने याद किया कि अंतरराष्ट्रीय दौरों के लिए फंड जुटाना बेहद कठिन होता था। एक बार न्यूजीलैंड दौरे के दौरान पैसों की कमी के कारण खिलाड़ियों को प्रवासी भारतीय परिवारों के घरों में रुकना पड़ा।
वहीं, इंग्लैंड दौरे के लिए अभिनेत्री मंदिरा बेदी ने हीरे के एक विज्ञापन से मिली पूरी राशि दान कर दी थी, जिससे खिलाड़ियों के हवाई टिकट का खर्च निकाला गया। उस दौर में कोई मैच फीस नहीं होती थी और खिलाड़ी अपने खर्च पर ट्रेन के सामान्य डिब्बों में सफर करती थीं।
कई बार टीमों के पास सिर्फ तीन बल्ले होते थे — एक खिलाड़ी के आउट होते ही उसका बल्ला अगली बल्लेबाज को दे दिया जाता था। कमरे में निजी टॉयलेट होना ‘लग्जरी’ माना जाता था और टूर्नामेंट कम बजट में आयोजित होते थे।
नूतन गावस्कर ने बताया कि कैसे मीडिया कवरेज भी लगभग न के बराबर होती थी — अखबारों में सिर्फ दो पंक्तियाँ होती थीं, “भारतीय महिलाएं जीतीं” या “भारतीय महिलाएं हारीं।” लेकिन आज वही खिलाड़ी, जैसे जेमिमा रोड्रिग्स, राष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्ने पर जगह पा रही हैं — यह बदलाव गर्व का विषय है।
पूर्व कप्तान, कमेंटेटर और प्रबंधक शांता रंगास्वामी ने भी उन कठिन दिनों को याद किया जब खिलाड़ियों को अपना बिस्तर और किट खुद उठाकर ले जानी पड़ती थी।
उन्होंने कहा, “हमने तब नींव रखी थी, जिसका फल आज की पीढ़ी भोग रही है।” आज भारतीय महिला टीम बिजनेस क्लास में यात्रा करती है, फाइव स्टार होटलों में ठहरती है और उन्हें हर वह सुविधा मिलती है जिसकी वे हकदार हैं।
नूतन गावस्कर कहती हैं, “यह देखकर सबसे ज्यादा संतोष मिलता है कि जिन कठिनाइयों से हम गुज़रे, आज की पीढ़ी को वे झेलनी नहीं पड़तीं।”
अनारक्षित डिब्बों से लेकर विश्व स्तरीय मंच तक, भारतीय महिला क्रिकेट ने आधी सदी में वह मुकाम हासिल किया है जो कभी सपना लगता था। अब यह टीम न सिर्फ इतिहास रचने की दहलीज़ पर खड़ी है, बल्कि यह उस संघर्ष, समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति की प्रतीक बन चुकी है जिसने भारत में महिला क्रिकेट की असली कहानी लिखी।