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WMO की डराने वाली रिपोर्ट

इतिहास का सबसे गर्म महीना बना 'मई 2026', भारत सहित कई एशियाई देशों में लू (Heatwave) ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

प्रकृति ने इंसानी लापरवाही के खिलाफ अपना सबसे प्रलयंकारी रूप दिखाना शुरू कर दिया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने आज एक आपातकालीन और अत्यंत गंभीर रिपोर्ट जारी करते हुए आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि मई 2026 मानव सभ्यता के इतिहास का अब तक का सबसे गर्म महीना बन गया है। जलवायु परिवर्तन और बेलगाम कार्बन उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का तापमान खतरनाक स्तर को पार कर चुका है, जिसके परिणामस्वरूप भारत और एशिया के कई देशों में जानलेवा लू (Heatwave) ने पिछले सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं।

वैश्विक तापमान और पर्यावरण के मोर्चे पर संयुक्त राष्ट्र (UN) की मौसम एजेंसी, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने आज एक ऐसी चेतावनी जारी की है, जिसने पूरी दुनिया की सरकारों और वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। WMO द्वारा जारी ‘स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट’ आपातकालीन बुलेटिन के अनुसार, मई 2026 ने धरती की सतह और महासागरों के औसत तापमान के मामले में पिछले सभी दशकों और सदियों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यह एक स्पष्ट संकेत है कि पृथ्वी अब ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (Global Warming) के चरण से आगे बढ़कर ‘ग्लोबल बॉयलिंग’ (Global Boiling) यानी उबलती हुई धरती की भयानक स्थिति में प्रवेश कर चुकी है।

भारत और एशिया में झुलसाने वाली गर्मी का कहर
रिपोर्ट में विशेष रूप से दक्षिण एशिया और भारत की स्थिति को सबसे अधिक चिंताजनक बताया गया है। मई 2026 के दौरान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और कई दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों ने उस जानलेवा लू का सामना किया है, जिसकी कल्पना भी पहले कभी नहीं की गई थी। भारत के कई राज्यों—विशेषकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र—में पारा 48 से 50 डिग्री सेल्सियस के खौफनाक आंकड़े को पार कर गया। इस भीषण गर्मी के कारण न केवल जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ, बल्कि हीटस्ट्रोक से सैंकड़ों जानें गईं, बिजली की मांग बढ़ने से कई जगह पावर ग्रिड फेल हो गए और कृषि क्षेत्र में खड़ी फसलें पूरी तरह से झुलस गईं।

आखिर क्यों टूट रहे हैं गर्मी के सारे रिकॉर्ड?
WMO के महानिदेशक ने इस अप्रत्याशित और जानलेवा गर्मी के पीछे सबसे मुख्य कारणों को स्पष्ट किया है। पहला और सबसे बड़ा कारण है—मानवीय गतिविधियों द्वारा लगातार हो रहा बेतहाशा ‘ग्रीनहाउस गैसों’ (Greenhouse Gases) और कार्बन का उत्सर्जन। कोयला, तेल और गैस (जीवाश्म ईंधन) के अंधाधुंध जलने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर अपने चरम बिंदु पर पहुंच गया है। दूसरा बड़ा कारण अल नीनो (El Nino) जैसी जटिल मौसमी प्रणालियां और समुद्र की सतह के तापमान का अप्रत्याशित रूप से गर्म होना है, जिसने पृथ्वी के पूरे प्राकृतिक मौसम चक्र (Weather Cycle) को बुरी तरह से बिगाड़ दिया है।

पेरिस समझौते (Paris Agreement) के लक्ष्य खतरे में
इस रिपोर्ट का सबसे डरावना पहलू यह है कि दुनिया अब पूर्व-औद्योगिक स्तर (Pre-industrial level) से 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की उस ‘लक्ष्मण रेखा’ को पार करने के बेहद करीब आ गई है, जिसे पेरिस जलवायु समझौते में तय किया गया था। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो दुनिया के कई हिस्से इंसानों के रहने लायक (Uninhabitable) नहीं बचेंगे। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और समुद्र के जलस्तर का बढ़ना मुंबई और जकार्ता जैसे तटीय शहरों के लिए एक सीधा अस्तित्व का संकट पैदा कर देगा।

तत्काल और कठोर कदम उठाने की अपील
WMO ने दुनिया भर के नीति निर्माताओं और राष्ट्राध्यक्षों से खुली अपील की है कि अब केवल वादों, सम्मेलनों और कागजी संधियों से काम नहीं चलेगा। दुनिया को जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर अपनी निर्भरता को तुरंत प्रभाव से खत्म करना होगा और नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) जैसे सौर और पवन ऊर्जा को युद्ध स्तर पर अपनाना होगा।

मई 2026 की यह भयानक गर्मी कोई अपवाद या इत्तेफाक नहीं है, बल्कि यह मानव जाति के भविष्य के लिए एक डरावना ट्रेलर है। यदि इंसान ने अब भी प्रकृति के साथ अपना खिलवाड़ नहीं रोका और कार्बन उत्सर्जन को शून्य (Net Zero) तक नहीं लाया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह नीले रंग का ग्रह केवल एक दहकता हुआ आग का गोला बनकर रह जाएगा।