महाविनाश की आहट: अंटार्कटिका के ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ में आई 30 किलोमीटर लंबी दरार, टूटने के कगार पर बर्फ का पहाड़

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण हमारी पृथ्वी एक ऐसे विनाशकारी मोड़ पर खड़ी है, जहां से वापसी शायद संभव न हो। नवीनतम उपग्रह चित्रों (Satellite Images) ने एक बेहद डरावना खुलासा किया है। अंटार्कटिका के विशाल थ्वाइट्स ग्लेशियर (Thwaites Glacier), जिसे दुनिया ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ (Doomsday Glacier) यानी ‘कयामत का ग्लेशियर’ के नाम से भी जानती है, उसमें 30 किलोमीटर लंबी एक नई और गहरी दरार आ गई है। वैज्ञानिकों ने गंभीर चेतावनी दी है कि यदि यह ग्लेशियर टूटकर पिघलता है, तो वैश्विक समुद्र स्तर में प्रलयंकारी वृद्धि होगी, जिससे दुनिया भर के तटीय शहर जलमग्न हो सकते हैं।
ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) का सबसे भयानक रूप अब धरती के सबसे ठंडे महाद्वीप अंटार्कटिका में साफ तौर पर दिखने लगा है। अंतरिक्ष से ली गई उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली नवीनतम उपग्रह तस्वीरों ने अंटार्कटिका के सबसे संवेदनशील हिस्से की एक खौफनाक तस्वीर दुनिया के सामने पेश की है। वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने थ्वाइट्स ग्लेशियर के मध्य भाग में एक विशाल और गहरी दरार (Crack) देखी है, जिसकी लंबाई 30 किलोमीटर से अधिक मापी गई है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यह दरार ग्लेशियर की बर्फ के उस अहम हिस्से (Ice Shelf) में अत्यंत तेजी से फैल रही है, जो इस पूरे हिमखंड को समुद्र में बहने से रोक कर रखता है।
क्या है ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
थ्वाइट्स ग्लेशियर बर्फ का कोई साधारण टुकड़ा नहीं है। इसका आकार ब्रिटेन (Britain) देश या अमेरिकी राज्य फ्लोरिडा (Florida) के बराबर है। इसे ‘डूम्सडे’ (प्रलय का दिन) ग्लेशियर इसलिए कहा जाता है क्योंकि अंटार्कटिका की जलवायु प्रणाली में इसकी भूमिका एक ‘कॉर्क’ (ढक्कन) की तरह है। यह ग्लेशियर अपने पीछे मौजूद अंटार्कटिका की बाकी विशाल बर्फ के लिए एक रक्षा प्राचीर का काम करता है। यदि यह ग्लेशियर टूटकर समुद्र में मिल जाता है, तो इसके पीछे मौजूद बर्फ का पूरा का पूरा साम्राज्य अस्थिर हो जाएगा और वह भी तेजी से समुद्र की ओर बहने लगेगा।
समुद्र के जलस्तर में होगी विनाशकारी वृद्धि
जलवायु वैज्ञानिकों और भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार, वर्तमान में भी वैश्विक समुद्र स्तर की वृद्धि में लगभग 4 प्रतिशत का योगदान अकेले इसी ग्लेशियर के पिघलने से आ रहा है। लेकिन, यदि यह 30 किलोमीटर लंबी दरार पूरे ग्लेशियर को दो टुकड़ों में बांट देती है और थ्वाइट्स ग्लेशियर पूरी तरह टूटकर पिघल जाता है, तो समुद्र के जलस्तर में अचानक 65 सेंटीमीटर (करीब 2 फीट) से अधिक की वृद्धि हो जाएगी। और यदि इसके टूटने से अंटार्कटिका की पीछे की बर्फ भी पिघलने लगती है, तो समुद्र के स्तर में 3 मीटर (लगभग 10 फीट) तक की महाविनाशकारी वृद्धि हो सकती है।
भारत सहित दुनिया के तटीय शहरों पर सीधा खतरा
समुद्र के जलस्तर में यह वृद्धि दुनिया के भूगोल को हमेशा के लिए बदल कर रख देगी। न्यूयॉर्क, मियामी, लंदन और टोक्यो जैसे दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक केंद्र पानी में डूब सकते हैं। भारत के लिए भी यह एक अत्यंत गंभीर खतरे की घंटी है। देश की 7500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा पर बसे मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और कोच्चि जैसे महानगरों के कई निचले हिस्से स्थायी रूप से जलमग्न हो सकते हैं। इससे न केवल अर्थव्यवस्था तबाह होगी, बल्कि करोड़ों लोगों को विस्थापन (Migration) के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे दुनिया में एक अभूतपूर्व शरणार्थी संकट पैदा हो जाएगा।
जागने का अंतिम अवसर
यह 30 किलोमीटर लंबी दरार इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि महासागरों का गर्म पानी अब नीचे से इस ग्लेशियर की जड़ों को तेजी से काट रहा है। वैज्ञानिकों ने दुनिया भर की सरकारों से भावुक अपील की है कि वे जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) का उपयोग बंद करें और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए तुरंत युद्ध स्तर पर कदम उठाएं। यदि दुनिया अब भी नहीं जागी, तो ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ का टूटना मानव सभ्यता के लिए एक ऐसी तबाही लेकर आएगा, जिसे दुनिया की कोई भी तकनीक या पैसा रोक नहीं सकेगा।