सुपरबग्स से मानवता को बचाने की सबसे बड़ी तैयारी
WHO ने 2050 तक 39 मिलियन संभावित मौतों को रोकने के लिए लागू किया 'ग्लोबल एक्शन प्लान'

दवाओं के बेअसर होने (Antimicrobial Resistance – AMR) के कारण दुनिया भर में लगातार बढ़ रहे ‘सुपरबग्स’ के खतरे से निपटने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। जिनेवा में संपन्न हुई 79वीं ‘विश्व स्वास्थ्य सभा’ (World Health Assembly) में सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से ‘ग्लोबल एक्शन प्लान ऑन एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस 2026-2036’ को अपना लिया है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस ‘शांत महामारी’ (Silent Pandemic) को रोकने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो वर्ष 2050 तक दुनिया भर में 39 मिलियन (लगभग 3.9 करोड़) लोग अपनी जान गवां सकते हैं।
जब से इंसान ने पेनिसिलिन (Penicillin) और अन्य एंटीबायोटिक्स की खोज की थी, तब से निमोनिया, टीबी और सर्जरी के दौरान होने वाले संक्रमणों का इलाज बहुत आसान हो गया था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इंसानों और जानवरों पर एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल ने बैक्टीरिया और वायरसों को इतना चालाक और ताकतवर बना दिया है कि अब उन पर इन जीवनरक्षक दवाओं का कोई असर ही नहीं होता। इसी जानलेवा स्थिति को ‘एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस’ (AMR) कहा जाता है।
इस बढ़ते संकट से निपटने के लिए 23 मई 2026 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने खाद्य और कृषि संगठन (FAO) तथा अन्य वैश्विक एजेंसियों के साथ मिलकर 10 वर्षों का एक व्यापक ‘ग्लोबल एक्शन प्लान’ (GAP-AMR) लागू किया है।
2050 तक 39 मिलियन मौतों का खौफनाक अनुमान
द लांसेट (The Lancet) और इको-एएमआर (EcoAMR) की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, AMR पहले से ही दुनिया में तबाही मचा रहा है। वर्ष 2021 में दुनिया भर में लगभग 4.71 मिलियन मौतों का सीधा संबंध इन जिद्दी ‘सुपरबग्स’ (दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया) से था।
WHO के विशेषज्ञों ने जिनेवा सम्मेलन में एक डरावना आंकड़ा प्रस्तुत करते हुए चेतावनी दी है कि यदि एंटीबायोटिक्स का दुरुपयोग इसी तरह जारी रहा, तो वर्ष 2025 से 2050 के बीच AMR के कारण 39 मिलियन से अधिक लोगों की मौत हो सकती है। इनमें सबसे अधिक प्रभावित वे देश होंगे जिनकी अर्थव्यवस्था कमजोर है (जैसे कि दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी देश)। इसके अलावा, 2050 तक विश्व की जीडीपी (GDP) को प्रतिवर्ष ट्रिलियन्स डॉलर का भारी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
नया ‘ग्लोबल एक्शन प्लान 2026-2036’ क्या है?
यह नया एक्शन प्लान वर्ष 2015 के पुराने ड्राफ्ट को बदलकर बनाया गया है और इसका मूल मंत्र ‘वन हेल्थ’ (One Health) एप्रोच है। ‘वन हेल्थ’ का अर्थ है कि इंसानों, जानवरों (विशेषकर पोल्ट्री और डेयरी फार्मिंग), और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ जोड़कर देखा जाएगा। इस प्लान के प्रमुख स्तंभ निम्नलिखित हैं:
1. कड़ी निगरानी और प्रतिबंध: डॉक्टर की पर्ची के बिना एंटीबायोटिक्स (विशेषकर हाई-डोज दवाइयों) की बिक्री पर पूरी दुनिया में सख्त रोक लगाई जाएगी।
2. पशुपालन में दुरुपयोग पर लगाम: दुनिया भर में कुल एंटीबायोटिक्स का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जानवरों को जल्दी बड़ा करने और उन्हें बीमारियों से बचाने के लिए खिलाया जाता है, जो बाद में दूध और मांस के जरिए इंसानों के शरीर में पहुंच जाता है। नए प्लान के तहत कृषि और पशुपालन में इसके उपयोग को न्यूनतम किया जाएगा।
3. स्वच्छता और प्रिवेंशन: ‘प्रिवेंशन फर्स्ट’ (Prevention-first) नीति के तहत अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण, साफ पीने के पानी, स्वच्छता (WASH) और टीकाकरण पर जोर दिया जाएगा, ताकि लोग बीमार ही न पड़ें और उन्हें एंटीबायोटिक की जरूरत ही न पड़े।
4. नई दवाओं के लिए फंड: फार्मास्यूटिकल कंपनियों को नए एंटीबायोटिक्स और वैक्सीन खोजने (R&D) के लिए वैश्विक स्तर पर भारी आर्थिक सहायता और रियायतें दी जाएंगी।
भारत के लिए क्या हैं मायने?
भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए AMR किसी भी बम से कम नहीं है। भारत में बिना पर्ची के केमिस्ट से एंटीबायोटिक्स खरीदकर खाने का चलन बहुत आम है। भारत सरकार को अब इस ‘ग्लोबल एक्शन प्लान’ के तहत अपने ‘नेशनल एक्शन प्लान’ (NAP-AMR) को और अधिक सख्त करना होगा। अस्पतालों में आईसीयू (ICU) के मरीजों पर एंटीबायोटिक्स के काम न करने की बढ़ती शिकायतें देश के स्वास्थ्य ढांचे के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी है। WHO की यह नई पहल दुनिया को इस ‘साइलेंट किलर’ से बचाने का आखिरी मौका हो सकती है।