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कुछ दिनों तक पत्नी से बात न करना क्रूरता नहीं, आत्महत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पति को किया बरी

नई दिल्ली ( राघवेंद्र प्रताप सिंह) : पति-पत्नी के बीच मतभेद वैवाहिक जीवन का एक अभिन्न अंग है और इसके परिणामस्वरूप पति-पत्नी के बीच संवाद टूट सकता है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी पति को केवल कुछ दिनों तक अपनी पत्नी से बात न करने के आधार पर क्रूरता का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंद की पीठ ने उस व्यक्ति को बरी कर दिया, जिसे निचली अदालत और मद्रास उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत अपनी पत्नी पर क्रूरता करने के आरोप में दोषी ठहराया था और तीन साल की जेल की सजा सुनाई थी।

वह 13 दिनों से अपनी पत्नी से बात नहीं कर रहा था, जिसके कारण उसने आत्महत्या कर ली। अदालत ने कहा, “इसलिए, किसी भी ठोस सबूत के अभाव में, मृतक से तेरह दिनों तक मात्र संपर्क न करना, बिना किसी पुख्ता सबूत के, किसी भी तरह से इस मामले के तथ्यों के आधार पर क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला अपीलकर्ता और मृतक के बीच किसी तरह के झगड़े का भी नहीं था, जिसके कारण निचली अदालत अपीलकर्ता को दोषी ठहरा सकती थी। कोर्ट ने कहा कि पति के खिलाफ क्रूरता के आरोप को साबित करने के लिए अपर्याप्त सबूत थे, जिसे उच्च न्यायालय के फैसले में ध्यान में नहीं रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह निर्धारित करना आवश्यक है कि क्या कृत्य की गंभीरता इस प्रकार की है कि वह किसी महिला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दे, उसे चोट पहुंचाए या उसके मानसिक स्वास्थ्य को खतरे में डाल दे। क्रूरता साबित करने के लिए, आरोपी का जानबूझकर किया गया आचरण बाध्यकारी प्रकृति का होना चाहिए।

इस संदर्भ में, शिकायत दर्ज करने के कुछ ही समय के भीतर लगातार उत्पीड़न एक प्रासंगिक कारक हो सकता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि मामूली झगड़े को धारा 498ए के तहत आरोप लगाने के लिए क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसलिए, न्यायालयों का यह कर्तव्य है कि वे तथ्यों और परिस्थितियों, आरोपी के कृत्य का विश्लेषण करें और उसके प्रभाव का आकलन करें।