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सियासी रुतबे और आत्मसम्मान की लड़ाई

सुरक्षा कटौती से नाराज लालू-राबड़ी ने लौटाई पूरी सरकारी सिक्योरिटी

पटना (अभिषेक सिंह): बिहार की सियासत में प्रतीकों और रुतबे का हमेशा से एक बड़ा महत्व रहा है। जब बात राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की हो, तो उनके हर कदम के गहरे राजनीतिक मायने होते हैं। हाल ही में गृह मंत्रालय की एक समीक्षा के बाद इन दोनों दिग्गज नेताओं की सुरक्षा श्रेणी (Z+) में कटौती कर दी गई। लेकिन इस फैसले पर लालू परिवार ने जो प्रतिक्रिया दी है, उसने सत्ता पक्ष को भी चौंका दिया है। सुरक्षा घटाए जाने से नाराज होकर लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी ने अपनी बची हुई पूरी सरकारी सुरक्षा भी वापस करने का सख्त फैसला लिया है।

यह सिर्फ सुरक्षा नहीं, सियासी संदेश है
एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर जब मैं इस घटनाक्रम को देखता हूँ, तो यह साफ समझ आता है कि यह महज़ कुछ सुरक्षाकर्मियों की वापसी का मामला नहीं है। यह सीधे तौर पर केंद्र और राज्य की एनडीए (NDA) सरकार के खिलाफ एक आक्रामक राजनीतिक संदेश है। सुरक्षा में कटौती को लालू परिवार अपने ‘सियासी अपमान’ के तौर पर देख रहा है। पूरी सुरक्षा वापस लौटाकर लालू यादव ने यह जताने की कोशिश की है कि वे सरकारी तंत्र या सुरक्षा के मोहताज नहीं हैं और उनका असली रक्षा कवच बिहार की जनता है।

सहानुभूति बटोरने का दांव?
राजनीति में ‘विक्टिम कार्ड’ या सहानुभूति बटोरना एक पुराना लेकिन कारगर हथियार रहा है। बिना सरकारी सुरक्षा के जनता के बीच जाना, उनके समर्थकों में यह संदेश देगा कि सरकार उनके लोकप्रिय नेताओं को जानबूझकर खतरे में डाल रही है। इससे न केवल आरजेडी का कोर वोटर और अधिक लामबंद होगा, बल्कि विपक्षी खेमे को भी सरकार पर ‘बदले की राजनीति’ का आरोप लगाने का एक पुख्ता मौका मिल गया है।

आगे क्या होगा?
सरकारी सुरक्षा वापस करने का मतलब है कि अब लालू और राबड़ी देवी की सुरक्षा का जिम्मा पार्टी के कार्यकर्ताओं और उनके निजी सुरक्षा गार्ड्स के हाथों में होगा। हालांकि, प्रोटोकॉल के तहत राज्य सरकार पूरी तरह से उनकी सुरक्षा से हाथ नहीं खींच सकती। प्रशासन को अब सादे कपड़ों में या अप्रत्यक्ष रूप से उनके आसपास सुरक्षा घेरा बनाए रखना होगा, क्योंकि किसी भी प्रकार की अनहोनी की स्थिति में पूरी जवाबदेही सीधे तौर पर राज्य सरकार की ही होगी। कुल मिलाकर, सुरक्षा वापसी का यह दांव लालू यादव की उस पुरानी और ठेठ राजनीतिक शैली का हिस्सा है, जहां वे अपने खिलाफ हुए हर प्रहार को अपने पक्ष में मोड़ने का हुनर बखूबी जानते हैं।