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‘एक्ट ईस्ट’ नीति को मिली नई धार: 8वीं संयुक्त आयोग की बैठक में एस. जयशंकर और सुगियोनो का महामंथन, इंडो-पैसिफिक में चीन को कड़ा संदेश

पल्लवी श्रीवास्तव/ नई दिल्ली | बदलते वैश्विक समीकरणों और इंडो-पैसिफिक (Indo-Pacific) क्षेत्र में गहराते कूटनीतिक तनाव के बीच, भारत ने अपनी ‘एक्ट ईस्ट’ (Act East) नीति को एक नई और आक्रामक धार दे दी है। इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगियोनो एक बेहद अहम और रणनीतिक दौरे पर नई दिल्ली पहुंच चुके हैं। उनकी इस यात्रा का मुख्य केंद्र 8वीं भारत-इंडोनेशिया संयुक्त आयोग की बैठक (JCM) है, जिसकी सह-अध्यक्षता उन्होंने भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ की। लगभग चार साल के लंबे अंतराल के बाद हो रही यह उच्च स्तरीय बैठक कोई सामान्य कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि यह एशिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक और समुद्री पड़ोसी देशों के बीच एक मजबूत रक्षा और आर्थिक धुरी बनाने का स्पष्ट ऐलान है।

कूटनीतिक महामंथन: किन मुद्दों पर बनी सहमति?
इस बैठक के दौरान दोनों देशों ने अपनी ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ (Comprehensive Strategic Partnership) की पूरी रूपरेखा की गहन समीक्षा की। बातचीत के केंद्र में सिर्फ पारंपरिक व्यापार नहीं था, बल्कि समुद्री सुरक्षा (Maritime Security), रक्षा सहयोग, डिजिटल कनेक्टिविटी, और क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) जैसे भविष्य के संवेदनशील मुद्दे छाए रहे। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और सुगियोनो ने इस बात पर जोर दिया कि रक्षा उद्योगों के बीच तालमेल बढ़ाना और दोनों देशों की सेनाओं के बीच साझा अभ्यास को और व्यापक रूप देना आज के अस्थिर वैश्विक माहौल की मांग है।

इसके अलावा, फार्मास्यूटिकल्स, फिनटेक (Fintech), कृषि और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में नए निवेश के रास्ते खोलने पर भी सैद्धांतिक सहमति बनी है। सबसे अहम पहलू अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को इंडोनेशिया के सुमात्रा प्रांत से सीधे समुद्री और शिपिंग मार्गों के जरिए जोड़ने की योजना रही। इस कनेक्टिविटी को रफ्तार देने से न केवल पर्यटन बढ़ेगा, बल्कि यह सामरिक दृष्टिकोण से भी एक ‘गेम चेंजर’ साबित होगा।

बीते साल की मजबूत नींव पर खड़ी नई इमारत
इस मौजूदा कूटनीतिक रफ्तार की असली पटकथा जनवरी 2025 में लिखी गई थी, जब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबिआंतो (Prabowo Subianto) भारत के 76वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो के बीच उस दौरान हुई मुलाकातों ने इस द्विपक्षीय रिश्ते में जो नई ऊर्जा फूंकी थी, विदेश मंत्री सुगियोनो का यह दौरा उसी विजन को जमीन पर उतारने का काम कर रहा है। दोनों देशों ने हाल ही में अपने कूटनीतिक संबंधों के 75 गौरवशाली वर्ष पूरे किए हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध अब एक मजबूत सैन्य और आर्थिक गठजोड़ में तब्दील हो रहे हैं।

इंडो-पैसिफिक की चौसर और आसियान का बढ़ता महत्व रणनीतिक परिप्रेक्ष्य:
अगर इस पूरी बैठक को भू-राजनीतिक चश्मे और कूटनीतिक बिसात पर रखकर देखा जाए, तो यह साफ हो जाता है कि भारत और इंडोनेशिया दोनों ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में किसी भी एक महाशक्ति के एकाधिकार को लेकर सतर्क हैं। इंडोनेशिया आसियान (ASEAN) देशों का सबसे प्रभावशाली और आर्थिक रूप से सबसे मजबूत सदस्य है। ऐसे में भारत के लिए जकार्ता का मजबूत साथ मिलना सिर्फ द्विपक्षीय व्यापार के आंकड़ों तक सीमित नहीं है; यह मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) जैसे विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों पर एक सुरक्षित और नियम-आधारित व्यवस्था (Rules-based order) बनाए रखने की सोची-समझी रणनीति है।

यह दौरा इस तथ्य को भी रेखांकित करता है कि भारत अब आसियान देशों के साथ सिर्फ अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ (योग, संस्कृति और प्राचीन इतिहास) तक सीमित नहीं रहना चाहता। नई दिल्ली अब ‘हार्ड पावर’ (रक्षा निर्यात, क्रिटिकल टेक और साइबर सुरक्षा) के मोर्चे पर भी दक्षिण पूर्व एशिया का एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता (Security Provider) बनने की ओर अग्रसर है। सुगियोनो की भारत यात्रा इस बात की खुली कूटनीतिक मुहर है कि जब बात स्वतंत्र और खुले समुद्री रास्तों (Free and Open Indo-Pacific) की होगी, तो भारत और इंडोनेशिया एक ही दिशा में कदम बढ़ाएंगे। यह नया गठजोड़ आने वाले समय में एशियाई कूटनीति के पूरे व्याकरण को बदलने की पूरी क्षमता रखता है।