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मुसीबतों का पिटारा नहीं खोलना चाहते… जजों के चयन पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा ऐसा?

नई दिल्ली ( पल्लवी श्रीवास्तव) : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम व्यवस्था देते हुए साफ कर दिया है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा संवैधानिक अदालतों के जजों के चयन की प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह चयन प्रक्रिया सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत भी नहीं आती है।

क्या था पूरा मामला?

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने हिमाचल प्रदेश के सीनियर ज्यूडिशियल ऑफिसर अरविंद मल्होत्रा की एक रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। मल्होत्रा का आरोप था कि हाईकोर्ट कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का पालन नहीं किया, जिसमें हाईकोर्ट के जज के रूप में उनकी पदोन्नति के लिए उनकी उम्मीदवारी पर विचार करने को कहा गया था।

इस पर बेंच ने दो टूक कहा, “हम कोई पेंडोरा बॉक्स (मुसीबतों का पिटारा) नहीं खोलना चाहते। हम कॉलेजियम के फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।” अदालत ने इशारा किया कि कुछ उम्मीदवारों को चुनने और उनके नाम की सिफारिश करने से पहले सैकड़ों उम्मीदवारों को बातचीत के लिए बुलाया जाता है।

केवल सीनियारिटी के आधार पर प्रमोशन का हक नहीं :

सुनवाई के दौरान मल्होत्रा के वकील बलबीर सिंह ने दलील दी कि 6 सितंबर 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस (CJ) के उस एकतरफा फैसले को नामंजूर कर दिया था जिसमें मल्होत्रा सहित दो वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों की उम्मीदवारी को नजरअंदाज किया गया था। वकील ने कहा कि चयन कॉलेजियम द्वारा सामूहिक रूप से किया जाना चाहिए था, न कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा व्यक्तिगत रूप से।

जब मल्होत्रा ने यह शिकायत की कि उनसे जूनियर न्यायिक अधिकारियों को पदोन्नति के लिए रिकमेंड किया गया है, तो बेंच ने स्पष्ट किया, “यह कॉलेजियम द्वारा आंकी गई सूटेबिलिटी का सवाल है। किसी जूनियर अधिकारी की सिफारिश किए जाने से किसी व्यक्ति को रिट याचिका के जरिए चुनौती देने का अधिकार नहीं मिल जाता। महज वरिष्ठता के कारण कोई पदोन्नति का हकदार नहीं हो जाता।” बेंच ने आगे कहा कि कॉलेजियम का फैसला उसकी अपनी संतुष्टि पर आधारित होता है और न तो हाईकोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट इस पर सवाल उठा सकते हैं।