वीपीएन (VPN) कंपनियों पर कसने जा रहा है शिकंजा: भारत में कार्यालय स्थापित करना होगा अनिवार्य, केंद्र सरकार ला रही कड़े नियम

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली: इंटरनेट की दुनिया में अपनी पहचान और लोकेशन छिपाने के लिए इस्तेमाल होने वाले वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) पर अब भारत सरकार का शिकंजा कसने जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा और साइबर अपराध नियंत्रण को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार वीपीएन प्रदाताओं (VPN Providers) के लिए एक नई और बेहद सख्त नियामक रूपरेखा (Regulatory Framework) लागू करने की तैयारी कर रही है। नए प्रस्तावित नियमों के तहत, भारत में अपनी सेवाएं दे रही सभी विदेशी और स्वदेशी वीपीएन कंपनियों को अनिवार्य रूप से देश के भीतर अपना एक भौतिक कार्यालय (Physical Office) स्थापित करना होगा और एक मुख्य अनुपालन अधिकारी (Chief Compliance Officer) की नियुक्ति करनी होगी।
वर्तमान में कई अंतरराष्ट्रीय वीपीएन कंपनियां भारत में काम कर रही हैं, लेकिन उनके सर्वर और कार्यालय विदेशों में स्थित हैं। सुरक्षा एजेंसियों (जैसे NIA, CBI, और साइबर सेल) की लंबे समय से यह शिकायत रही है कि जब भी किसी बड़े साइबर हमले, टेरर फंडिंग या डार्क वेब से जुड़े अपराध की जांच होती है, तो अपराधी अपनी डिजिटल फुटप्रिंट छिपाने के लिए इन्हीं विदेशी वीपीएन नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। विदेशी धरती पर स्थित होने के कारण ये कंपनियां अक्सर भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को समय पर यूजर डेटा या लॉग्स (Logs) साझा करने से इनकार कर देती हैं, जिससे जांच अधर में लटक जाती है।
नए आईटी नियमों के मसौदे के अनुसार, वीपीएन कंपनियों को अब ‘डेटा लोकलाइजेशन’ (Data Localization) के नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। उन्हें अपने ग्राहकों की बुनियादी जानकारी (KYC) और आईपी लॉग्स (IP Logs) को कम से कम 5 साल तक सुरक्षित रखना होगा। यदि कोई वीपीएन प्रदाता भारत में कार्यालय स्थापित करने या नोडल अधिकारी नियुक्त करने में विफल रहता है, तो उसकी सेवाओं को भारतीय इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (ISPs) के माध्यम से स्थायी रूप से ब्लॉक कर दिया जाएगा।
हालांकि, सरकार के इस संभावित कदम का डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं और गोपनीयता (Privacy) के पैरोकारों द्वारा विरोध भी शुरू हो गया है। उनका तर्क है कि वीपीएन कॉरपोरेट सुरक्षा, पत्रकारों और आम नागरिकों की निजता के लिए आवश्यक है, और लॉग्स अनिवार्य करने से वीपीएन का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। इसके जवाब में सरकारी सूत्रों का स्पष्ट कहना है कि निजता का अधिकार राष्ट्रीय सुरक्षा और अपराध नियंत्रण की कीमत पर नहीं दिया जा सकता। यह नया कानून भारतीय साइबर स्पेस को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है।