रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स क्षमता बढ़ाने के लिए ₹1,200 करोड़ के स्वदेशी कार्गो ड्रोन सौदे को दी मंजूरी

Raghvendra Pratap Singh/ नई दिल्ली: भारतीय सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को एक बड़ी गति देते हुए, रक्षा मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक समझौते पर मुहर लगाई है। सेना की लॉजिस्टिक्स (आपूर्ति श्रृंखला) क्षमता को अभेद्य और तीव्र बनाने के उद्देश्य से मंत्रालय ने ₹1,200 करोड़ के स्वदेशी कार्गो ड्रोन सौदे को मंजूरी दे दी है। यह कदम खासतौर पर ऊंचाई वाले और दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों तक रसद, गोला-बारूद और चिकित्सा उपकरण पहुंचाने में मील का पत्थर साबित होगा।
दुर्गम क्षेत्रों में गेम-चेंजर साबित होंगे कार्गो ड्रोन
लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) और सियाचिन जैसे दुनिया के सबसे ऊंचे और कठिन युद्ध क्षेत्रों में भारतीय सेना को मौसम और भौगोलिक चुनौतियों का भारी सामना करना पड़ता है। अभी तक इन क्षेत्रों में आपूर्ति के लिए खच्चरों, पोर्टर्स या हेलीकॉप्टरों पर निर्भर रहना पड़ता था, जो न केवल खर्चीला है, बल्कि खराब मौसम में अत्यधिक जोखिम भरा भी होता है। नए स्वदेशी कार्गो ड्रोन इन चुनौतियों को समाप्त कर देंगे। ये हेवी-लिफ्ट ड्रोन 50 से 100 किलोग्राम तक का पेलोड लेकर 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर उड़ान भरने में सक्षम हैं।
स्वदेशी रक्षा उद्योग (Make in India) को बड़ा बूस्ट
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, यह 1,200 करोड़ रुपये का पूरा टेंडर पूरी तरह से भारतीय रक्षा स्टार्टअप्स और घरेलू एयरोस्पेस कंपनियों के लिए आरक्षित था। इस सौदे से न केवल विदेशी निर्भरता कम होगी, बल्कि देश के भीतर रक्षा अनुसंधान और विनिर्माण को भी भारी प्रोत्साहन मिलेगा। इन ड्रोन्स में अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जीपीएस नेविगेशन सिस्टम लगा है, जो इन्हें रात के अंधेरे और खराब मौसम में भी सटीक लोकेशन पर सामान ड्रॉप करने में सक्षम बनाता है।
रणनीतिक बढ़त
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्धनीति में तेज सप्लाई चेन जीत का अहम आधार होती है। इन ड्रोन्स के सेना में शामिल होने से अग्रिम चौकियों पर तैनात जवानों को बिना किसी देरी के मदद पहुंचाई जा सकेगी। इसके साथ ही, आपातकालीन स्थिति में जवानों को मेडिकल किट या ब्लड यूनिट पहुंचाने में लगने वाला समय अब घंटों से घटकर मात्र कुछ मिनटों का रह जाएगा।
इस सौदे के साथ ही भारत ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा और सेना के आधुनिकीकरण के लिए स्वदेशी तकनीक पर पूरा भरोसा जता रहा है। रक्षा मंत्रालय की इस मंजूरी के बाद, उम्मीद है कि अगले 6 से 8 महीनों के भीतर इन ड्रोन्स का पहला जत्था भारतीय सेना के उत्तरी कमान को सौंप दिया जाएगा।