सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को चुनावी वादों (Freebies) पर वित्तीय ऑडिट रिपोर्ट जमा करने के लिए 4 हफ्ते का अंतिम समय दिया

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में चुनावों के दौरान ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ (Freebies) बांटने की बढ़ती संस्कृति पर सर्वोच्च न्यायालय ने अब बेहद सख्त रुख अपना लिया है। मंगलवार को एक अहम जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया है कि वे अपनी लोकलुभावन योजनाओं और चुनावी वादों से जुड़े वित्तीय खर्चों की विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट अगले 4 सप्ताह के भीतर हर हाल में अदालत में जमा करें। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह समय-सीमा अंतिम है और इसमें कोई अतिरिक्त मोहलत नहीं दी जाएगी।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए अनियंत्रित रूप से मुफ्त बिजली, पानी, लैपटॉप और नकद ट्रांसफर जैसी घोषणाएं कर रहे हैं, बिना यह सोचे कि राज्य के खजाने (Exchequer) पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने कहा कि “कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा और मुफ्त की रेवड़ियों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींची जानी चाहिए। करदाताओं (Taxpayers) का पैसा राज्य के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए है, न कि राजनीतिक दलों के वोट बैंक को साधने के लिए।”
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने भी हाल ही में अपनी एक रिपोर्ट में राज्यों के बढ़ते राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) और कर्ज के बोझ को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि कई राज्य अपने वार्षिक बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल मुफ्त योजनाओं को पूरा करने में खर्च कर रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क निर्माण जैसे जरूरी सेक्टर प्रभावित हो रहे हैं। कुछ राज्यों का कर्ज उनके सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (Election Commission) को भी इस मामले में पार्टी बनाते हुए पूछा है कि चुनाव आचार संहिता (Model Code of Conduct) में ऐसे वादों को नियंत्रित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत का यह आदेश उन राज्यों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है जो आगामी विधानसभा चुनावों में भारी-भरकम मुफ्त योजनाओं की घोषणा करने की तैयारी कर रहे थे।
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस दखल के बाद देश में चुनाव प्रचार के तरीकों में एक बड़ा नीतिगत बदलाव आ सकता है। अब राजनीतिक दलों को जनता से वादे करने के साथ-साथ यह भी बताना पड़ सकता है कि वे इन वादों को पूरा करने के लिए बजट का प्रबंध कहां से करेंगे। यह कदम न केवल देश की अर्थव्यवस्था को दिवालिया होने से बचाएगा, बल्कि पारदर्शी और जवाबदेह लोकतंत्र की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित होगा।