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केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ 14 दिन से अनशन कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ता अमित भटनागर हिरासत में लिए गए

राघवेंद्र प्रताप सिंह/  छतरपुर / भोपाल: भारत की पहली और बहुचर्चित नदी जोड़ो परियोजना ‘केन-बेतवा लिंक’ (Ken-Betwa River Linking Project) एक बार फिर भारी विरोध और विवादों के घेरे में आ गई है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में इस परियोजना के विनाशकारी पर्यावरणीय प्रभावों के खिलाफ पिछले 14 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता अमित भटनागर को सोमवार देर रात पुलिस ने जबरन हिरासत में ले लिया। प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद बुंदेलखंड क्षेत्र में तनाव की स्थिति पैदा हो गई है।

क्यों हो रहा है विरोध?

अमित भटनागर और स्थानीय पर्यावरण समितियों का कहना है कि विकास के नाम पर बुंदेलखंड की पारिस्थितिकी (Ecology) की हत्या की जा रही है। इस 45,000 करोड़ रुपये की परियोजना के तहत पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) का लगभग 6,000 हेक्टेयर से अधिक घना जंगल पूरी तरह से पानी में डूब जाएगा। कार्यकर्ताओं का दावा है कि इससे न केवल बाघों का प्राकृतिक आवास छिन जाएगा, बल्कि लगभग 23 लाख से अधिक पुराने पेड़ों को काटना पड़ेगा, जो इस सूखे इलाके के लिए किसी पर्यावरणीय आपदा से कम नहीं है।

आधी रात को पुलिस की कार्रवाई

सूत्रों के अनुसार, 14 दिनों के अनशन के कारण अमित भटनागर का स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा था। जिला प्रशासन ने कई बार उनसे बातचीत कर अनशन तोड़ने की अपील की, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि जब तक परियोजना की निष्पक्ष ‘इकोलॉजिकल ऑडिट’ (Ecological Audit) रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाती, वे पीछे नहीं हटेंगे। अंततः कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए भारी पुलिस बल ने धरना स्थल पर छापा मारा और भटनागर को एम्बुलेंस में डालकर जिला अस्पताल के आईसीयू (ICU) में भर्ती करा दिया।

विपक्ष और पर्यावरणविदों की तीखी प्रतिक्रिया

इस पुलिसिया कार्रवाई की देश भर के पर्यावरणविदों ने कड़ी निंदा की है। सोशल मीडिया पर #SavePannaTigerReserve ट्रेंड करने लगा है। विपक्षी दलों ने भी राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि सरकार आदिवासियों और पर्यावरण के रक्षकों की आवाज को तानाशाही के दम पर कुचलना चाहती है। हालांकि, सरकार का तर्क है कि यह परियोजना बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों की प्यास बुझाने और लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई के लिए मील का पत्थर साबित होगी। अब यह देखना है कि यह जन-आंदोलन सरकार को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर करता है या नहीं।