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समावेशी शिक्षा की ओर कदम: जनजातीय छात्रों की छात्रवृत्ति के लिए पारिवारिक आय सीमा बढ़ाने की उठी प्रबल मांग, बदलेगी हकीकत

इंडियन व्यू टीम/ नई दिल्ली: समाज के सबसे हाशिए पर खड़े वर्गों को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव की मांग ज़ोर पकड़ रही है। विभिन्न सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों और जनप्रतिनिधियों ने केंद्र और राज्य सरकारों से पुरज़ोर अपील की है कि अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति (Scholarships) का लाभ उठाने के लिए निर्धारित ‘पारिवारिक आय सीमा’ (Family Income Ceiling) को जल्द से जल्द बढ़ाया जाए। यह मांग आदिवासी समुदायों के शैक्षिक सशक्तिकरण के लिहाज़ से बेहद अहम मानी जा रही है।

वर्तमान नियमों के अनुसार, प्री-मैट्रिक या पोस्ट-मैट्रिक सरकारी छात्रवृत्ति प्राप्त करने के लिए छात्र के परिवार की वार्षिक आय की एक निश्चित सीमा (जैसे 2 लाख या 2.5 लाख रुपये) तय है। हालांकि, तर्क यह दिया जा रहा है कि बढ़ती महंगाई, शिक्षा के खर्चों में बेतहाशा वृद्धि और बदलती आर्थिक वास्तविकताओं के बीच यह पुरानी आय सीमा अब पूरी तरह से अव्यावहारिक हो गई है। कई जनजातीय परिवार, जो केवल गुज़ारा भत्ते लायक ही कमा पाते हैं, वे कागज़ों पर इस आय सीमा से थोड़ा ऊपर होने के कारण छात्रवृत्ति से वंचित रह जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके बच्चों को बीच में ही पढ़ाई छोड़नी (Drop-out) पड़ती है।

आदिवासी अधिकार संगठनों का कहना है कि उच्च शिक्षा, विशेषकर इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का खर्च इतना अधिक है कि बिना पर्याप्त सरकारी सहायता के एक सामान्य जनजातीय परिवार के लिए इसे वहन करना असंभव है। आय सीमा को बढ़ाकर 5 लाख या उससे अधिक किए जाने से लाखों होनहार आदिवासी छात्रों को अपने सपने पूरे करने का अवसर मिलेगा। नीति निर्माताओं से आग्रह किया गया है कि वे इसे आर्थिक बोझ के रूप में न देखें, बल्कि इसे देश के जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) और समावेशी राष्ट्र निर्माण में एक दीर्घकालिक निवेश के रूप में लें।