वैश्विक मंच पर भारत का दोटूक जवाब
'विदेशी फंड का नियमन हमारा संप्रभु अधिकार, अमेरिका में भी हैं FARA जैसे कानून' - भारतीय राजदूत
विवेक ओझा/ वाशिंगटन डीसी / नई दिल्ली: विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में किए गए संशोधनों और भारत में कुछ गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लाइसेंस रद्द होने को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठ रहे सवालों का भारत ने कड़ा और कूटनीतिक जवाब दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका (US) में भारत के राजदूत ने एक कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट रूप से कहा है कि देश के भीतर विदेशी धन के प्रवाह को विनियमित (Regulate) करना भारत का एक ‘संप्रभु कदम’ (Sovereign Step) है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से यह पूरी तरह न्यायसंगत है।
हाल के दिनों में कई पश्चिमी मानवाधिकार संगठनों और अमेरिकी थिंक-टैंक्स ने भारत सरकार पर आरोप लगाया था कि वह FCRA कानूनों का इस्तेमाल नागरिक समाज (Civil Society) की आवाज़ को दबाने और असहमति को कुचलने के लिए कर रही है। इन आलोचनाओं का सीधा और तार्किक खंडन करते हुए, भारतीय राजदूत ने अमेरिकी नीति निर्माताओं को आईना दिखाया। उन्होंने याद दिलाया कि स्वयं अमेरिका के पास ‘विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम’ (FARA – Foreign Agents Registration Act) जैसा एक बेहद सख्त कानून मौजूद है, जो विदेशी धन और प्रभाव को अमेरिकी राजनीति व समाज में हस्तक्षेप करने से रोकता है।
राजदूत ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि भारत में कोई भी NGO विदेशी चंदा प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते वह देश के कानूनों का पालन करे और वित्तीय पारदर्शिता (Financial Transparency) बनाए रखे। जब विदेशी धन का इस्तेमाल घोषित सामाजिक कार्यों के बजाय धर्मांतरण (Conversion), राजनीतिक लॉबिंग, या विकास परियोजनाओं (जैसे परमाणु ऊर्जा संयंत्र या खनन) को बाधित करने के लिए किया जाता है, तो एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों (IR) के जानकारों के अनुसार, भारतीय राजदूत का यह बयान कूटनीतिक रूप से बेहद आक्रामक और संतुलित है। यह दर्शाता है कि भारत अब पश्चिमी देशों के ‘उपदेशात्मक’ (Sermonizing) रवैये को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है और अपने घरेलू कानूनों का बचाव पूरी दृढ़ता के साथ वैश्विक मंचों पर कर रहा है। यह बयान स्पष्ट संदेश देता है कि भारत विदेशी निवेश और सहायता का स्वागत करता है, लेकिन इसे भारतीय संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की कीमत पर अनुमति नहीं दी जा सकती।