स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई: स्टाइपेंड न मिलने से आक्रोशित आंध्र प्रदेश के 9,000 जूनियर डॉक्टर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर, इमरजेंसी सेवाएं ठप

सरिता त्रिपाठी/ विजयवाड़ा / अमरावती: आंध्र प्रदेश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इस वक्त एक बेहद गंभीर और अभूतपूर्व संकट से गुज़र रही है। राज्य के हज़ारों मरीज़ों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि आंध्र प्रदेश के करीब 9,000 जूनियर डॉक्टर एक चरणबद्ध और राज्यव्यापी हड़ताल (Statewide strike) पर चले गए हैं। इस बड़े आंदोलन के कारण राज्य भर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह चरमरा गई हैं।
हड़ताल का यह मुख्य विवाद स्टाइपेंड (Stipend – मानदेय) में संशोधन की उस मांग को लेकर है, जो जनवरी 2026 से ही राज्य सरकार के पास लंबित है। महीनों से अपनी जायज़ मांगों की अनदेखी किए जाने से नाराज़ इन युवा डॉक्टरों ने अब कड़ा रुख अपना लिया है। स्थिति इतनी नाज़ुक हो गई है कि इन प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने 17 अगस्त से पूरे आंध्र प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से अपनी आपातकालीन सेवाओं (Emergency services) को भी वापस ले लिया है।
आंदोलन की ज़मीनी हकीकत का अंदाज़ा विजयवाड़ा के सिद्धार्थ मेडिकल कॉलेज (Siddhartha Medical College) के बाहर के दृश्य से लगाया जा सकता है। हड़ताल के आठवें दिन (सोमवार) यहाँ बड़ी संख्या में जूनियर डॉक्टरों ने एकत्र होकर सरकार के खिलाफ ज़ोरदार नारेबाजी की। डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि वे कोरोना काल और अन्य महामारियों के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर दिन-रात काम करते हैं, लेकिन जब उनके जायज़ हकों और आर्थिक सुरक्षा की बात आती है, तो सरकार लगातार टालमटोल का रवैया अपनाती है।
आपातकालीन सेवाओं (Emergency Duties) के बहिष्कार ने राज्य के स्वास्थ्य विभाग के हाथ-पांव फुला दिए हैं। सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहने वाले गरीब और ग्रामीण मरीज़ों के लिए यह स्थिति बेहद पीड़ादायक बन गई है, क्योंकि सर्जरी, ओपीडी और ट्रॉमा केयर में भारी देरी हो रही है। अब सभी की नज़रें राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री कार्यालय पर टिकी हैं कि वे इस गतिरोध को तोड़ने और डॉक्टरों को काम पर वापस लौटाने के लिए कितनी जल्दी ठोस कदम उठाते हैं। अगर इस संकट का जल्द समाधान नहीं निकला, तो राज्य में एक बड़ी स्वास्थ्य त्रासदी खड़ी हो सकती है।