नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘सिर्फ कई मुकदमे दर्ज होना पेशेवर अपराधी का प्रमाण नहीं’, रद्द की हिस्ट्रीशीट

राघवेंद्र प्रताप सिंह/प्रयागराज: व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों और पुलिसिया कार्यप्रणाली की मनमानी पर अंकुश लगाने की दिशा में इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने एक बेहद ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल कई आपराधिक मुकदमे दर्ज होना भर उसे ‘पेशेवर अपराधी’ (Habitual/Professional Criminal) साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी विधिक सिद्धांत के आधार पर अदालत ने याचिकाकर्ता सतेंद्र उर्फ डॉक्टर के खिलाफ पुलिस द्वारा खोली गई बी-क्लास हिस्ट्रीशीट को पूरी तरह से रद्द (Quashed) कर दिया है।
मामले की विस्तृत सुनवाई न्यायमूर्ति की खंडपीठ के समक्ष हुई। याचिकाकर्ता सतेंद्र की ओर से अदालत में दलील दी गई कि स्थानीय पुलिस ने पुरानी रंजिश और बिना किसी ठोस आधार के उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस रेगुलेशन के तहत ‘क्लास-बी’ हिस्ट्रीशीट खोल दी थी, जिसके कारण पुलिस उन्हें लगातार परेशान कर रही थी और समाज में उनकी प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंच रहा था। हालांकि उनके ऊपर कुछ मुकदमे दर्ज थे, लेकिन उनमें से कई में वे बरी हो चुके थे या वे मामले गंभीर प्रकृति के नहीं थे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस रेगुलेशन के प्रावधानों की गहराई से व्याख्या करते हुए कहा कि किसी नागरिक की हिस्ट्रीशीट खोलना उसकी निजता और सम्मानपूर्वक जीने के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) पर सीधा प्रहार करता है। अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस को किसी भी व्यक्ति की हिस्ट्रीशीट खोलने से पहले इस बात के पुख्ता और ठोस सबूत जुटाने चाहिए कि वह व्यक्ति वास्तव में आदतन अपराधों में लिप्त है और समाज की शांति के लिए स्थायी खतरा बन चुका है। महज़ एफआईआर दर्ज होने की संख्या को आधार बनाकर किसी को पेशेवर अपराधी का ठप्पा नहीं लगाया जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला पुलिस की उस मनमानी कार्यशैली पर एक बड़ा अंकुश है, जिसके तहत अक्सर मामूली विवादों या राजनीतिक कारणों से दर्ज मुकदमों के आधार पर लोगों की हिस्ट्रीशीट खोल दी जाती थी। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून का राज स्थापित करने के नाम पर नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। यह फैसला प्रदेश भर के उन हजारों लोगों के लिए एक बड़ी राहत और कानूनी नज़ीर बनेगा जो पुलिस की ऐसी कार्रवाइयों से पीड़ित हैं।