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निजी ज़मीन मालिकों को ‘सेल डीड’ के लिए मजबूर नहीं कर सकती सरकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला

राघवेन्द्र प्रताप सिंह
प्रयागराज / लखनऊ

विकास परियोजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर निजी ज़मीन मालिकों की ज़मीनों के अधिग्रहण को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने एक बेहद अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी अधिकारी या एजेंसियां किसी भी निजी ज़मीन मालिक को अपनी ज़मीन के अधिग्रहण के लिए ‘सेल डीड’ (बिक्री विलेख या Sale Deed) निष्पादित करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती हैं। यह फैसला नागरिकों के संपत्ति अधिकारों की रक्षा के लिहाज़ से एक बड़ा मील का पत्थर है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे ज़मीन मालिकों (याचिकाकर्ताओं) को परेशान न करें और सेल डीड निष्पादित करने के लिए उनकी सहमति (consent) जबरन या दबाव डालकर प्राप्त न करें। अक्सर यह देखा जाता है कि सरकारी मशीनरी विकास कार्यों के नाम पर किसानों और आम लोगों पर अपनी ज़मीनें सस्ते दामों पर या बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के बेचने का दबाव बनाती है।

अदालत ने कानून के दो अहम पहलुओं—’स्वैच्छिक बिक्री’ (voluntary sale) और ‘अनिवार्य अधिग्रहण’ (compulsory acquisition)—के बीच के अंतर को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है। फैसले में कहा गया है कि ये दोनों पूरी तरह से अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपनी ज़मीन नहीं बेचना चाहता, तो सरकार उसे डरा-धमका कर या प्रशासनिक दबाव डालकर सेल डीड पर हस्ताक्षर नहीं करवा सकती। यदि सरकार को ज़मीन की अत्यंत आवश्यकता है, तो उसे ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम’ के तहत तय की गई अनिवार्य और पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा, जिसमें उचित मुआवज़ा और पुनर्वास शामिल है।

यह फैसला उत्तर प्रदेश में चल रहे कई बड़े हाईवे, एक्सप्रेस-वे और औद्योगिक कॉरिडोर प्रोजेक्ट्स को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले राजस्व अधिकारियों के लिए यह एक कड़ी चेतावनी है कि वे अपनी प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग कर किसानों को प्रताड़ित नहीं कर सकते। कानून के जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह स्पष्ट रुख राज्य भर के उन हज़ारों किसानों को एक बड़ी कानूनी ढाल प्रदान करेगा, जो सरकारी एजेंसियों के अनुचित दबाव का सामना कर रहे हैं।