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लोकसभा के सत्रावसान में 10 दिन की देरी पर कांग्रेस ने उठाए गंभीर सवाल: जयराम रमेश ने पूछा- ‘क्या परिसीमन बिल के लिए 2/3 बहुमत जुटा रही है सरकार?’

सरिता त्रिपाठी
नई दिल्ली

संसदीय प्रक्रियाओं और सदन के कामकाज को लेकर केंद्र की सत्ताधारी एनडीए सरकार और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने मानसून सत्र के समाप्त होने के बाद लोकसभा के सत्रावसान (prorogation) में हो रही ‘असामान्य देरी’ को लेकर सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पार्टी के संचार प्रभारी जयराम रमेश (Jairam Ramesh) ने इस देरी को सीधे तौर पर सरकार की एक बड़ी और ‘संदिग्ध’ राजनीतिक रणनीति से जोड़ दिया है।

जयराम रमेश ने एक बयान जारी कर इस बात पर प्रकाश डाला कि लोकसभा को मानसून सत्र (Monsoon Session) के दौरान अनिश्चित काल के लिए स्थगित (adjourned sine die) किए हुए पूरे दस दिन बीत चुके हैं। संसदीय परंपराओं के अनुसार, सदन के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने और उसके औपचारिक सत्रावसान (formal end) के बीच का समय अंतराल आमतौर पर केवल दो से चार दिनों (two to four days) का होता है। लेकिन इस बार 10 दिन बीत जाने के बाद भी सत्रावसान की कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है, जो बेहद असामान्य है।

इस प्रक्रियात्मक देरी के पीछे एक बड़ी साज़िश का अंदेशा जताते हुए जयराम रमेश ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) और सरकार पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने सवाल किया है कि क्या सदन का सत्रावसान इसलिए रोका गया है क्योंकि सरकार अभी भी ‘परिसीमन से जुड़े किसी महत्वपूर्ण बिल’ (delimitation-linked Bill) को पास कराने के लिए पर्दे के पीछे दो-तिहाई बहुमत (2/3rd majority) जुटाने की कोशिश कर रही है?

संसदीय नियमों के अनुसार, जब तक सदन का सत्रावसान नहीं होता, तब तक तकनीकी रूप से सत्र चालू माना जाता है और सरकार बिना नया सत्र बुलाए किसी भी समय सदन की बैठक फिर से आहूत कर सकती है। विपक्ष को डर है कि सरकार इस तकनीकी ‘लूपहोल’ का इस्तेमाल करके अचानक कोई विवादित विधेयक (जैसे परिसीमन या चुनाव सुधार से जुड़ा बिल) ला सकती है, जिसके लिए संविधान संशोधन और विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यह मुद्दा आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति में एक नए ‘संसदीय अविश्वास’ के दौर को जन्म दे सकता है।