चिकित्सा विज्ञान की ऐतिहासिक छलांग: कॉर्ड ट्रांसप्लांट और ‘CAR T-Cell थेरेपी’ से कैंसर व थैलेसीमिया के खिलाफ मिली अभूतपूर्व सफलता

सरिता त्रिपाठी
नई दिल्ली
भारत का चिकित्सा क्षेत्र कैंसर और गंभीर रक्त विकारों जैसी जानलेवा बीमारियों से लड़ने में रोज़ नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। इसी कड़ी में, नारायणा हेल्थ (Narayana Health) के डॉक्टरों ने कैंसर के इलाज में कॉर्ड ट्रांसप्लांट और ‘कार टी-सेल थेरेपी’ (CAR T-cell therapy) का उपयोग करते हुए एक नया और ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है। इन नवीनतम तकनीकों ने उन मरीज़ों को नई ज़िंदगी दी है, जिनके लिए इलाज के सभी पारंपरिक विकल्प खत्म हो चुके थे।
डॉक्टरों ने दो प्रमुख मेडिकल सफलताओं (medical breakthroughs) की रिपोर्ट साझा की है। पहली सफलता एक सात वर्षीय थैलेसीमिया (thalassaemia) पीड़ित बच्चे के मामले में मिली है। यह बच्चा अब ‘हैप्लो-कॉर्ड ट्रांसप्लांट’ (Haplo-cord transplant) की जटिल प्रक्रिया के बाद पूरी तरह से रक्त चढ़ाने (transfusion-free) की आवश्यकता से मुक्त हो चुका है। थैलेसीमिया जैसी अनुवांशिक बीमारी में ताउम्र बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है, ऐसे में यह ट्रांसप्लांट इस बीमारी से जूझ रहे लाखों बच्चों के लिए एक स्थायी इलाज की उम्मीद लेकर आया है।
दूसरी बड़ी कामयाबी ब्रेन कैंसर के मोर्चे पर हासिल हुई है। अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि एक 62 वर्षीय ब्रेन कैंसर (brain cancer) के मरीज़ ने ‘डुअल-टारगेट कार-टी सेल थेरेपी’ (dual-target CAR-T cell therapy) के प्रति बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। कार-टी सेल थेरेपी एक अत्यधिक उन्नत ‘इम्यूनोथेरेपी’ है, जिसमें मरीज़ की ही प्रतिरोधक कोशिकाओं (T-cells) को प्रयोगशाला में जेनेटिकली री-प्रोग्राम किया जाता है, ताकि वे शरीर में वापस जाकर कैंसर कोशिकाओं को सटीक रूप से पहचानें और उन्हें नष्ट कर दें।
ब्रेन कैंसर जैसे जटिल और आक्रामक ट्यूमर में इस थेरेपी का प्रभावी होना मेडिकल साइंस के लिए एक बड़ा ‘गेम-चेंजर’ है। भारत में इन महंगी और जटिल थैरेपीज़ का सफलतापूर्वक परीक्षण न केवल हमारे डॉक्टरों की विशेषज्ञता को दर्शाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि भविष्य में आम भारतीयों को इलाज के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।