ध्रुव जुरेल ने शतक के बाद दिखाई खास चीज, बताया ‘जय जवान, जय किसान’ टैटू का राज
ध्रुव जुरेल ने सोमवार (24 अगस्त) को श्रीलंका के खिलाफ दूसरे टेस्ट मैच के दूसरे दिन कमाल की बल्लेबाजी और शतक जड़ा, जो उनके टेस्ट करियर का दूसरा शतक था। इस दौरान खास बात यह थी कि शतक पूरा करने के बाद जुरेल ने सलामी दी और अपनी बांह पर बना एक स्पेशल टैटू भी दिखाया। उनके बाएं हाथ पर ‘जय जवान, जय किसान’ वाला टैटू था।
इसके पीछे की वजह भी इस बल्लेबाज ने बताई है कि आखिर उन्होंने इस स्लोगन को क्यों लिखवाया है, जो एक समय पर बहुत ज्यादा फेमस रहा है। मैच के बाद ध्रुव जुरेल ने बताया कि उनके दादा किसान थे और पिता सैनिक रहे हैं। उन्होंने कहा, “यही मेरी जड़ें हैं और मैं इन्हें भूलना नहीं चाहता। इसलिए वह सलामी मेरे पिता और दादा के लिए थी।”
जुरेल ने यह भी बताया कि भारत ‘ए’ के साथ श्रीलंका का दौरा करने से उन्हें मौजूदा श्रृंखला की तैयारी में काफी मदद मिली। उन्होंने अपने शतक को पूरा करने में मदद करने वाले मोहम्मद सिराज का भी खास तौर पर जिक्र किया। सिराज ने 29 गेंदें खेलकर जुरेल को शतक पूरा करने का मौका दिया।

जुरेल ने मुस्कुराते हुए कहा कि जब भी वह सिराज से बात करते हैं, उन्हें लगता है कि सिराज उनसे ज्यादा जश्न मनाते हैं। उन्होंने सिराज की रक्षात्मक बल्लेबाजी की भी तारीफ की। हालांकि, जैसे ही शतक पूरा हुआ तो मोहम्मद सिराज ने बड़ा शॉट खेलने की कोशिश की और वे आउट हो गए, जबकि ध्रुव जुरेल ने शतक पूरा करने के बाद दो छक्के लगाए और फिर जैसे ही भारत का स्कोर 500 के पार हुआ तो कप्तान शुभमन गिल ने पारी को घोषित करने का इशारा कर दिया।
इसके बाद बल्लेबाजी के लिए श्रीलंका की टीम उतरी और दो विकेट भारत को दिन के आखिर में मिल गए। इस तरह श्रीलंका पर इस मैच में ज्यादा दबाव है। इस मुकाबले में सिर्फ ध्रुव जुरेल नहीं, बल्कि देवदत्त पडिक्कल ने भी शतक जड़ा था। इसके अलावा कुछ अर्धशतक भी भारतीय बल्लेबाजों की ओर से आए। इनमें ऋषभ पंत और कप्तान शुभमन गिल का नाम शामिल है।
आपको बता दें, ‘जय जवान जय किसान’ का प्रसिद्ध नारा भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था। मामला साल 1965 से जुड़ा है। यह नारा तत्कालीन प्रधानमंत्री ने भारत-पाकिस्तान युद्ध और देश में पड़े अकाल/खाद्य संकट के समय दिया था, जिसका उद्देश्य देश की रक्षा करने वाले सैनिकों यानी जवानों और अन्न पैदा करने वाले किसानों के योगदान का सम्मान करना और उनका हौसला बढ़ाना था।