क्या 150 दिनों में फीका पड़ा बालेन शाह का जादू? काठमांडू में Gen-Z मांग रहे इस्तीफा, अपनों ने भी खोला मोर्चा

काठमांडू/नेपाल ( विवेक ओझा) : नेपाल की राजनीति में जिस युवा और ‘जेन-जेड’ (Gen-Z) लहर ने बालेंद्र ‘बालेन’ शाह को सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाया था, महज 150 दिनों के भीतर वही लहर अब उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। पूर्व अंडरग्राउंड रैपर, सिविल इंजीनियर और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह ने 27 मार्च 2026 को जब नेपाल के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली, तो उन्हें 17 साल पुरानी पारंपरिक राजनीति के एक नए विकल्प के रूप में देखा गया था। लेकिन उनका यह जादुई प्रभाव सिर्फ पांच महीनों में ही फीका पड़ता दिख रहा है। आज उन्हें सड़कों पर जन-आक्रोश, संसद में विपक्ष के तीखे हमलों और अपनी ही ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (RSP) में बगावत का सामना करना पड़ रहा है।
क्यों सड़कों पर उतरे युवा (Gen-Z) और आम नागरिक?
बालेन शाह को युवाओं ने एक ‘सिस्टम रिफॉर्मर’ (सुधारक) के तौर पर चुना था, लेकिन सत्ता में आने के कुछ ही हफ्तों बाद उनका यह हनीमून पीरियड खत्म होने लगा। काठमांडू के माइतीघर मंडाला में युवा प्रदर्शनकारी भारी संख्या में जुटकर अब अपने ही चुने हुए पीएम से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। इस जनाक्रोश के पीछे कई अहम कारण हैं:
- सख्त कस्टम नियम: अप्रैल में सरकार ने भारत से सटी खुली सीमा पर सीमा शुल्क (Customs) नियमों को बेहद सख्त कर दिया। इससे दैनिक जरूरतों, राशन और दवाओं के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर नेपाली नागरिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
- युवा ड्राइवर का आत्मदाह: जुलाई में गणेश नेपाली नामक 25 वर्षीय एक राइड-शेयर ड्राइवर ने म्युनिसिपल पुलिस की कार्रवाई से तंग आकर काठमांडू में आत्मदाह कर लिया। इस दुखद घटना ने युवाओं के गुस्से को पूरी तरह से भड़का दिया।
- बिना पुनर्वास बस्तियां उजाड़ना: भूमिहीन गरीबों और झुग्गी बस्तियों को बिना किसी उचित पुनर्वास योजना के हटाने (एंटी-स्क्वाटर ड्राइव) के सरकार के फैसलों ने जनता को बालेन से दूर कर दिया है।
भारत को लेकर विवादित बयान और कूटनीतिक चूक
बालेन शाह की मुश्किलें केवल घरेलू मोर्चे तक सीमित नहीं हैं। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद पर दिए गए उनके हालिया विवादास्पद बयानों ने भी आग में घी का काम किया है। बालेन द्वारा इस द्विपक्षीय मुद्दे में तीसरे पक्ष की मदद लेने की बात कहने से नेपाल का विपक्ष भड़क उठा है। इसके अलावा, सीमावर्ती इलाकों में हुई सांप्रदायिक झड़पों पर उनकी देर से आई प्रतिक्रिया ने भी सरकार की काफी किरकिरी की है।
संसद से दूरी और अपनी ही पार्टी में दरार
बालेन शाह की एकतरफा कार्यशैली पर अब उनकी अपनी पार्टी और संसद के भीतर से भी तीखे सवाल उठ रहे हैं:
- संसद से नदारद: प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन संसद की शुरुआती 39 बैठकों में से केवल 5 में शामिल हुए। उनकी इस अनुपस्थिति पर विपक्ष के हंगामे के बाद स्पीकर को उन्हें संसद में पेश होकर जवाब देने का निर्देश देना पड़ा है।
- RSP में विरोध के सुर: राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के भीतर सांसद और वरिष्ठ नेता पीएम के रवैये से नाराज हैं। उनका आरोप है कि पीएम पार्टी के ढांचे और नेताओं से दूरी बनाए हुए हैं और बिना किसी राजनीतिक तालमेल के सरकार चला रहे हैं।
महज 150 दिनों में एक ऐतिहासिक और लोकप्रिय जनादेश का एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल जाना यह दर्शाता है कि एक अच्छा विपक्षी नेता होना और सफलतापूर्वक सरकार चलाना दो अलग-अलग बातें हैं। अगर बालेन शाह ने जल्द ही अपनी कूटनीति, कार्यशैली और अपनों के साथ तालमेल में सुधार नहीं किया, तो उनकी कुर्सी पर मंडरा रहा यह संकट और भी गहरा सकता है।