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15 दिन के लिए आया और 33 साल तक गायब रहा, जापानी पुलिस के होश उड़ाने वाली इस गिरफ्तारी की पूरी इनसाइड स्टोरी

टोक्यो: ( अभिषेक सिंह) : जापान से एक ऐसी हैरतअंगेज, सस्पेंस और फिल्मी कहानी सामने आई है, जिस पर एक पल के लिए यकीन करना मुश्किल हो जाता है। एक 72 वर्षीय दक्षिण कोरियाई बुजुर्ग को जापानी पुलिस ने हाल ही में गिरफ्तार किया है। यह कोई आम गिरफ्तारी या रूटीन क्रिमिनल केस नहीं है, बल्कि इस शख्स ने दुनिया की सबसे सख्त, हाई-टेक और चाक-चौबंद माने जाने वाली जापानी पुलिस व्यवस्था को पूरे 33 साल तक बेवकूफ बनाया। वह महज 15 दिन के वीजा पर जापान आया था और तीन दशक से ज्यादा समय तक अंडरग्राउंड होकर रह रहा था। इतने लंबे समय तक बिना किसी वैध पहचान के किसी विदेशी मुल्क में छिपे रहने की इस घटना ने जापान के इमिग्रेशन और आंतरिक सुरक्षा सिस्टम की कार्यप्रणाली पर कई बड़े और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

1993 में रची गई थी मास्टरप्लान की कहानी, छोटे भाई के पासपोर्ट से किया था बड़ा खेल :

इस पूरे ड्रामे और लुका-छिपी के खेल की शुरुआत आज से ठीक 33 साल पहले सितंबर 1993 में हुई थी। उस समय दक्षिण कोरिया में आर्थिक स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं थी और बेहतर वेतन वाली नौकरियों का भारी अभाव था। बेरोजगारी और कम वेतन से हताश होकर इस शख्स ने ज्यादा पैसे कमाने की चाहत में जापान जाने की योजना बनाई। लेकिन कानूनी तौर पर लंबे समय के लिए जापान का वीजा हासिल करना उसके लिए संभव नहीं था। इसलिए उसने इमिग्रेशन को धोखा देने के लिए एक बेहद शातिर चाल चली। इस व्यक्ति ने अपनी असली पहचान छिपाते हुए अपने सगे छोटे भाई के पासपोर्ट का इस्तेमाल किया और इसी फर्जीवाड़े के दम पर 15 दिन के टूरिस्ट वीजा पर जापान की सीमा में प्रवेश कर लिया। उसका मकसद महज 15 दिन घूमकर वापस लौटना था ही नहीं, बल्कि वह वहीं हमेशा के लिए बसने और पैसे कमाने का पूरा फुलप्रूफ प्लान बनाकर आया था।

मजदूरी और छिपने के दम पर गुजारे 33 साल, पुलिस और खुफिया एजेंसियों को ऐसे दिया चकमा :

वीजा की 15 दिन की अनुमति वाली अवधि खत्म होने के बाद वह शख्स जापान की भारी भीड़ और चमक-दमक वाली दुनिया में कहीं गुम हो गया। यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर बिना किसी वैध दस्तावेज, बिना किसी बैंक खाते या बिना किसी सरकारी पहचान पत्र के वह 33 साल तक कैसे जिंदा रहा और पुलिस की रडार से कैसे बचा रहा? पुलिस की सघन पूछताछ में इस रहस्य से भी पर्दा उठ गया। खुलासा हुआ कि पकड़े जाने के डर से उसने कभी कोई पक्की नौकरी या ऐसा काम नहीं किया जहां कागजी कार्रवाई या बैकग्राउंड वेरिफिकेशन की जरूरत हो। वह 33 सालों तक अलग-अलग अनजान जगहों पर दिहाड़ी मजदूरी (डे लेबर) और अनौपचारिक छोटे-मोटे काम करके अपना पेट पालता रहा। वह हमेशा उन तंग इलाकों या बस्तियों में रहता था जहां कोई उससे उसकी असली पहचान या कागजात न मांगे। उसने अपनी जिंदगी को बिल्कुल एक साए की तरह बना लिया था।

एक छोटी सी चूक और 33 साल का पर्दाफाश, ऐसे पुलिस के हत्थे चढ़ा यह शातिर शख्स :

अपराध चाहे कितना भी शातिराना क्यों न हो, एक दिन सामने आ ही जाता है। 33 सालों तक पूरी सफलता से छिपने के बाद आखिरकार एक छोटी सी सूचना इस शख्स के लिए काल बन गई। शिजूओका प्रीफेक्चरल पुलिस के अधिकारियों ने मीडिया को बताया कि इसी साल जून 2026 में उन्हें एक अनजान मुखबिर से गुप्त सूचना मिली थी। सूचना में बताया गया था कि शिजूओका के याइजू शहर में कोई विदेशी नागरिक बिना वैध कागजात के अवैध रूप से रह रहा है। इस टिप के आधार पर पुलिस ने तुरंत रेड नहीं मारी, बल्कि गुप्त तरीके से अपनी जांच शुरू की और संदिग्ध व्यक्ति की हर गतिविधि पर बारीक नजर रखी। पूरी तरह से पुष्टि होने के बाद पुलिस ने जाल बिछाया और 26 अगस्त 2026 को इस 72 वर्षीय बुजुर्ग को याइजू शहर से धर दबोचा। पूछताछ के दौरान उसने बिना किसी विरोध के अपना जुर्म कबूल कर लिया और अपनी 33 साल की हैरतअंगेज कहानी पुलिस के सामने बयां कर दी।

33 साल तक रहा, लेकिन पुलिस ने क्यों लगाया सिर्फ 26 साल का आरोप? कानून का यह पेच समझना है जरूरी
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प कानूनी पेच यह है कि यह शख्स जापान में 33 साल तक अवैध रूप से रहा, लेकिन जापानी पुलिस ने उस पर केवल 26 साल के अवैध निवास (इलीगल स्टे) का आरोप तय किया है। आम जनता के लिए यह बात थोड़ी हैरान करने वाली हो सकती है, लेकिन इसके पीछे जापान के इमिग्रेशन कानून का एक खास नियम जिम्मेदार है।

दरअसल, फरवरी 2000 में जापान के आप्रवासन (इमिग्रेशन) कानून में एक बड़ा और सख्त बदलाव किया गया था, जिसके तहत अवैध रूप से मुल्क में रुकने (ओवरस्टे) को एक सतत यानी लगातार जारी रहने वाला अपराध माना गया। कानून के इसी तकनीकी पहलू के कारण, पुलिस ने अपराध की गिनती कानून लागू होने के समय (फरवरी 2000) से शुरू की है। इसलिए पिछले 26 वर्षों की अवधि को ही पुलिस ने आधिकारिक तौर पर अपराध मानकर उसके खिलाफ अपनी चार्जशीट में शामिल किया है, भले ही वह भौतिक रूप से 33 साल से वहां मौजूद था।

इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि भले ही सिस्टम कितना भी हाई-टेक और मजबूत क्यों न हो, इंसानी शातिरपन किसी को भी तीन दशक तक छिपने का मौका दे सकता है। यह मामला अब पूरे जापान और दक्षिण कोरिया की मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब इमिग्रेशन अधिकारी इस बुजुर्ग को डिपोर्ट (निर्वासित) करने और उसे उचित कानूनी सजा देने की प्रक्रिया में जुटे हुए हैं।