Trending

डिजिटल इंडिया का दूसरा पहलू: ‘अकाउंट नहीं मिला’ जैसी तकनीकी बाधाओं से जूझते करोड़ों यूज़र्स, साइबर सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता पर उठते गंभीर सवाल

विवेक ओझा
नई दिल्ली

भारत आज ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान के तहत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन चुका है। यूपीआई पेमेंट्स से लेकर सरकारी सेवाओं तक, सब कुछ अब हमारे स्मार्टफोन और एक ऑनलाइन अकाउंट पर निर्भर है। लेकिन इस डिजिटल चकाचौंध के पीछे एक बेहद अंधकारमय और निराशाजनक पहलू भी है, जिसका सामना रोज़ाना देश के लाखों यूज़र्स को करना पड़ता है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर “अकाउंट नहीं मिला” (Can’t find account) या लॉगिन विफल होने जैसी एरर स्क्रीन्स आज आम जनता के लिए एक बड़ा मानसिक और व्यावहारिक सिरदर्द बन चुकी हैं।

एक ताज़ा मामले में, एक यूज़र को गूगल (Google) की लॉगिन स्क्रीन पर एक स्पष्ट एरर का सामना करना पड़ा: “हम 9288286398 के साथ कोई अकाउंट नहीं ढूंढ पा रहे हैं। कोई अन्य मोबाइल नंबर या ईमेल पता आज़माएं।” यह केवल एक स्क्रीनशॉट या एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि यह देश के उस विशाल ‘डिजिटल डिवाइड’ और तकनीकी खामियों का एक जीता-जागता प्रमाण है, जो रोज़ाना करोड़ों भारतीयों को ऑनलाइन दुनिया से बाहर (Lockout) कर रहा है।

आज के समय में हमारे बैंक खाते, आधार कार्ड, ई-मेल, सोशल मीडिया और यहां तक कि सरकारी राशन और पेंशन की सेवाएं भी एक मोबाइल नंबर से जुड़ी (Linked) होती हैं। भारत के दूरसंचार क्षेत्र में ‘नंबर रीसाइक्लिंग’ (Number Recycling) एक बहुत बड़ी समस्या है। यदि कोई व्यक्ति कुछ महीनों तक अपना सिम रिचार्ज नहीं करा पाता है (जो कि ग्रामीण और गरीब तबके में आम है), तो टेलीकॉम कंपनियां उस नंबर को बंद करके किसी दूसरे व्यक्ति को जारी कर देती हैं। जब वह नया व्यक्ति उस नंबर से कोई डिजिटल अकाउंट बनाने या रिकवर करने की कोशिश करता है, या जब पुराना व्यक्ति अपने डिजिटल लॉकर तक पहुंचने का प्रयास करता है, तो दोनों को ही इस प्रकार की गंभीर ‘पहचान के संकट’ (Identity Crisis) का सामना करना पड़ता है।

इसके अतिरिक्त, बहुराष्ट्रीय टेक कंपनियों (जैसे Google, Facebook आदि) के अकाउंट रिकवरी तंत्र (Account Recovery Mechanisms) इतने जटिल और स्वचालित (Automated) होते हैं कि एक सामान्य भारतीय यूज़र के लिए, विशेषकर ग्रामीण और बुज़ुर्ग आबादी के लिए, बिना किसी मानवीय मदद (Customer Care) के अपने अकाउंट को वापस पाना लगभग असंभव हो जाता है। जब कोई व्यक्ति अपने ईमेल या क्लाउड स्टोरेज का एक्सेस खो देता है, तो वह केवल एक अकाउंट नहीं खोता, बल्कि अपने ज़रूरी दस्तावेज़, पुरानी तस्वीरें, व्यावसायिक संपर्क और कई बार अपनी मेहनत की कमाई भी खो देता है।

यह स्थिति साइबर सुरक्षा के मोर्चे पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। अकाउंट्स के अचानक ब्लॉक होने या नंबर मिसमैच होने के कारण साइबर ठग (Cyber Frauds) इसका फायदा उठाते हैं और लोगों को ‘अकाउंट रिकवरी’ का झांसा देकर ठगी का शिकार बनाते हैं। सरकार और टेक कंपनियों को अब यह समझना होगा कि केवल डिजिटल ढांचे का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है; एक ऐसा सुरक्षित, समावेशी और यूज़र-फ्रेंडली सिस्टम बनाना भी उतना ही ज़रूरी है जो भारत की तकनीकी और सामाजिक वास्तविकताओं के अनुकूल हो। तकनीकी विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब वह एक आम आदमी को सशक्त बनाए, न कि उसे पासवर्ड और रिकवरी के अंतहीन चक्रव्यूह में फंसा कर रख दे।