कोयंबटूर: मरुधमलाई मंदिर में 184 फुट ऊंची मुरुगन प्रतिमा का प्रस्ताव, पर्यावरणीय चिंताओं के बीच अनुकूल स्थल की तलाश जारी

राघवेन्द्र प्रताप सिंह
कोयंबटूर
तमिलनाडु की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत में भगवान मुरुगन का स्थान अत्यंत सर्वोच्च है। राज्य भर में फैले मुरुगन मंदिरों में हर साल लाखों श्रद्धालु अपनी आस्था प्रकट करने आते हैं। इसी धार्मिक भावना और पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, कोयंबटूर के प्रसिद्ध मरुधमलाई मंदिर प्रशासन ने एक बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना का खाका तैयार किया है। हालांकि, पश्चिमी घाट (Western Ghats) की संवेदनशील पारिस्थितिकी (ecology) को ध्यान में रखते हुए, यह परियोजना कई पर्यावरणीय और कानूनी चुनौतियों से होकर गुज़र रही है।
ताज़ा घटनाक्रम के अनुसार, कोयंबटूर में स्थित मरुधमलाई सुब्रमण्यस्वामी मंदिर (Marudhamalai Subramaniaswamy Temple) का प्रशासन प्रस्तावित 184 फुट ऊंची मुरुगन प्रतिमा के निर्माण के लिए एक ऐसे स्थान की तलाश कर रहा है जो पूरी तरह से ‘पर्यावरण के अनुकूल’ (environmentally suitable site) हो। यह प्रस्तावित विशाल प्रतिमा (184-ft Murugan statue) न केवल दक्षिण भारत में वास्तुकला का एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगी, बल्कि यह कोयंबटूर के पर्यटन मानचित्र पर भी एक प्रमुख मील का पत्थर साबित होगी।
इस विशाल परियोजना को लेकर प्रशासन की यह सतर्कता और पर्यावरणीय चिंता अचानक नहीं आई है। रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण के अनुकूल स्थल खोजने का यह घटनाक्रम एक हालिया ‘रिट याचिका’ (writ petition) के दायर होने के बाद सामने आया है। इस याचिका में संभवतः पश्चिमी घाट की तलहटी में होने वाले भारी निर्माण कार्यों से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और हरियाली को पहुंचने वाले नुकसान को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई थीं। मरुधमलाई मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है, वह जैव विविधता से समृद्ध नीलगिरि बायोस्फीयर का ही एक विस्तार है, जहां हाथियों और अन्य जंगली जानवरों का निरंतर आवागमन रहता है।
पर्यावरणविदों और नागरिक समाज का मानना है कि 184 फुट ऊंची प्रतिमा के निर्माण के लिए भारी मात्रा में कंक्रीट, इस्पात और अन्य निर्माण सामग्री का उपयोग किया जाएगा। इसके अलावा, इतनी विशाल संरचना को खड़ा करने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और ज़मीन का समतलीकरण करना पड़ेगा, जो पहाड़ी की प्राकृतिक ढलान और मिट्टी की पकड़ को कमज़ोर कर सकता है। इससे भविष्य में भूस्खलन (landslides) का खतरा बढ़ सकता है। रिट याचिकाकर्ताओं की मुख्य चिंता यही है कि धार्मिक आस्था के नाम पर प्रकृति के साथ ऐसा कोई खिलवाड़ नहीं होना चाहिए जो अपूरणीय क्षति का कारण बने।
इन कानूनी और पर्यावरणीय अड़चनों को समझते हुए, मरुधमलाई मंदिर प्रशासन और हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग अब बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रहे हैं। प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि यह प्रतिमा मंदिर परिसर या पहाड़ी के ऐसे हिस्से में स्थापित की जाए जहां पेड़ों को कम से कम नुकसान हो और वन्यजीवों के कॉरिडोर (Elephant corridors) में कोई बाधा उत्पन्न न हो। इसके लिए भूवैज्ञानिकों (Geologists) और पर्यावरण विशेषज्ञों की एक समिति का भी गठन किया जा सकता है, जो मिट्टी की भार वहन क्षमता (load-bearing capacity) और पारिस्थितिक प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन करेगी।
तमिलनाडु में पहले भी ईशा फाउंडेशन की आदियोगी प्रतिमा (Adiyogi statue) और अन्य विशाल संरचनाओं के निर्माण को लेकर पर्यावरणीय बहसें छिड़ चुकी हैं। मरुधमलाई में भगवान मुरुगन की इस भव्य प्रतिमा का प्रस्ताव इस बात का एक और उदाहरण है कि आधुनिक भारत में विकास, धार्मिक विस्तार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल होता जा रहा है। यदि मंदिर प्रशासन एक ऐसा ‘पर्यावरण के अनुकूल’ स्थान खोजने में सफल रहता है जो अदालत और पर्यावरणविदों दोनों को संतुष्ट कर सके, तो यह प्रतिमा निश्चित रूप से वास्तुकला और इंजीनियरिंग का एक उत्कृष्ट नमूना बनकर उभरेगी, जो सदियों तक श्रद्धालुओं को आकर्षित करती रहेगी।