‘क्या इसी दिन के लिए IPS बने थे?’ जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर टूटती लाठियां देख भड़के जस्टिस भुइयां, युवा अफसरों को लगाई कड़ी फटकार!

सरिता त्रिपाठी
नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर (Jantar Mantar) पर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हुए पुलिसिया लाठीचार्ज ने अब एक बड़ा तूल पकड़ लिया है। इस बर्बर कार्रवाई पर न्यायपालिका की ओर से बेहद कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने इस घटना पर गहरी नाराजगी और दुख जताया है। पुलिस के इस रवैये पर सख्त टिप्पणी करते हुए उन्होंने उस पुलिसिया तंत्र पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां उच्च शिक्षित युवा आईपीएस (IPS) अफसर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए संवाद के बजाय सीधे ‘डंडे की ताकत’ का इस्तेमाल कर रहे हैं।
‘पढ़े-लिखे युवा अफसरों को यूं लाठियां भांजते देखना बेहद दुखद और निराशाजनक’
जस्टिस भुइयां ने पुलिस की इस आक्रामक कार्यप्रणाली पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के युवा आईपीएस अधिकारी देश की सबसे कठिन परीक्षा (UPSC) पास करके आते हैं। उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे आधुनिक, संवेदनशील और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने वाली ‘स्मार्ट पुलिसिंग’ का उदाहरण पेश करेंगे। लेकिन जब वही होनहार और युवा अफसर सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से पीटते और बल प्रयोग करते नजर आते हैं, तो यह दृश्य सिर्फ दुखद ही नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम के लिए बेहद निराशाजनक है।
भीड़ नियंत्रण के नाम पर ‘बल प्रयोग’ ही पहला विकल्प क्यों?
न्यायपालिका का हमेशा से यह मानना रहा है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाना और विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। जस्टिस भुइयां की यह तीखी टिप्पणी पुलिस महकमे की उस पुरानी और औपनिवेशिक मानसिकता पर करारा प्रहार है, जिसमें भीड़ देखते ही लाठीचार्ज को सबसे आसान और पहला उपाय मान लिया जाता है। उनका इशारा साफ था कि पुलिस का मुख्य काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को पुलिसिया बूटों तले कुचलना।
खाकी की कार्यप्रणाली के लिए एक कड़ा ‘वेक-अप कॉल’
जस्टिस भुइयां का यह तल्ख बयान पुलिस प्रशासन, खासकर पुलिस फोर्स के युवा नेतृत्व (Young Officers) के लिए एक कड़ा संदेश है। जब न्यायपालिका का एक शीर्ष न्यायाधीश पुलिस की कार्यप्रणाली पर इस तरह का दर्द और गुस्सा जाहिर करता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पुलिस को अपने ‘क्राउड मैनेजमेंट’ (Crowd Management) और जनता से निपटने के तरीकों में तुरंत बड़े बदलाव करने की जरूरत है।
खाकी वर्दी आम आदमी की सुरक्षा और विश्वास के लिए होती है, दहशत फैलाने के लिए नहीं। जंतर-मंतर की इस घटना और जस्टिस भुइयां की कड़ी टिप्पणी ने देश के सामने यह अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी नई पीढ़ी के पुलिस अधिकारी भी उसी पुरानी अंग्रेजों वाली लाठी-डंडे की व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह जाएंगे?