मिट्टी या पीओपी? गणेश प्रतिमा निर्माताओं और विक्रेताओं के सामने खड़ी हुई बड़ी दुविधा

अभिषेक सिंह
बेंगलुरु
गणेश चतुर्थी का पावन पर्व जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, बेंगलुरु के पारंपरिक मूर्ति निर्माताओं और विक्रेताओं के सामने आजीविका और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की एक बड़ी दुविधा खड़ी हो गई है। बेंगलुरु के बाज़ारों में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है: मिट्टी (Clay) की मूर्तियां बनाई जाएं या प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की? इस धर्मसंकट ने बेंगलुरु के गणेश प्रतिमा निर्माताओं और विक्रेताओं (Ganesha idol makers, sellers) को एक असहज विकल्प (uneasy choice) का सामना करने पर मजबूर कर दिया है।
गुरुवार को होने वाले गणेश चतुर्थी (Ganesha Chaturthi) उत्सव की तैयारियां शहर भर में जोरों पर हैं। इसी सिलसिले में, बेंगलुरु के पॉटरी टाउन (Pottery Town) के कारीगरों को बिक्री के लिए गणेश की मूर्तियों (Ganesha idols) को लोड करते हुए देखा जा सकता है। पॉटरी टाउन दशकों से शहर में पारंपरिक मिट्टी की कला और मूर्तिकला का केंद्र रहा है, जहां पीढ़ियों से कारीगर इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।
हालांकि, हाल के वर्षों में प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से बनी मूर्तियों के कारण जल निकायों में होने वाले प्रदूषण को लेकर एक बड़ी और सकारात्मक जागरूकता आई है। राज्य सरकार (State government), विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और पर्यावरण कार्यकर्ताओं (environmental activists) द्वारा आम लोगों को पर्यावरण के अनुकूल (eco-friendly) गणेश मूर्तियां खरीदने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है।
कारीगरों के लिए यह स्थिति इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि PoP की मूर्तियां बनाने में आसान, वज़न में हल्की और दिखने में अधिक आकर्षक होती हैं, जिसके कारण बाज़ार में उनकी मांग बनी रहती है। लेकिन PoP पानी में आसानी से नहीं घुलता और इसमें इस्तेमाल होने वाले रासायनिक रंग झीलों और तालाबों के पानी को अत्यधिक ज़हरीला बना देते हैं। इसके विपरीत, शुद्ध मिट्टी से बनी मूर्तियां पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित होती हैं, लेकिन इन्हें बनाने में अधिक मेहनत, समय और कौशल की आवश्यकता होती है।
सरकार और पर्यावरण संस्थाओं के दबाव के कारण अब ग्राहकों का रुझान ‘ईको-फ्रेंडली’ मूर्तियों की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। विक्रेताओं को यह डर सता रहा है कि यदि वे भारी मात्रा में PoP की मूर्तियां स्टॉक कर लेते हैं, तो सरकारी प्रतिबंधों और बदलती उपभोक्ता प्राथमिकताओं के कारण उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। यह संक्रमण काल पारंपरिक कारीगरों के लिए भले ही कठिन हो, लेकिन एक स्थायी और प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण के लिए मिट्टी की मूर्तियों की ओर वापसी ही एकमात्र सही और दीर्घकालिक विकल्प है।