जलवायु परिवर्तन और हिमनद पतन के बीच गहराता संबंध: चीनी शोधकर्ताओं ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती आपदाओं की दी गंभीर चेतावनी

द इंडियन व्यू टीम
बीजिंग / नई दिल्ली
‘दुनिया की छत’ और ‘तीसरे ध्रुव’ (Third Pole) के रूप में विख्यात तिब्बती पठार और हिमालयी क्षेत्र एक अभूतपूर्व और प्राणघातक पारिस्थितिक संकट के मुहाने पर खड़े हैं। वैश्विक तापमान में हो रही लगातार वृद्धि ने इन विशाल बर्फीले पहाड़ों की स्थिरता को बुरी तरह से खतरे में डाल दिया है। इस संदर्भ में एक नया और बेहद डरावना अध्ययन सामने आया है। चीनी शोधकर्ताओं ने हिमालय में होने वाले हिमनद पतन (glacial collapse) और जलवायु परिवर्तन के बीच एक सीधा और गहरा संबंध देखा है, तथा भविष्य में बढ़ती आपदा जोखिमों (rising disaster risks) को लेकर एक बहुत ही गंभीर चेतावनी जारी की है। यह अध्ययन पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक बहुत बड़ा ‘रेड अलर्ट’ है।
हाल ही में प्रकाशित इस विस्तृत अध्ययन ने ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने के चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। शोधकर्ताओं ने उपग्रह डेटा और ज़मीनी सर्वेक्षणों के आधार पर पाया है कि तिब्बती पठार का कुल ग्लेशियर क्षेत्र (glacier area) भारी गिरावट का शिकार हुआ है। अध्ययन के अनुसार, यह क्षेत्र पहले के 51,000 वर्ग किलोमीटर से सिकुड़कर अब मात्र 39,000 वर्ग किलोमीटर रह गया है। 12,000 वर्ग किलोमीटर की इस भारी बर्फानी कमी का सीधा अर्थ यह है कि अरबों टन ताज़ा पानी अप्रत्याशित रूप से पिघल कर बह रहा है। इसके परिणामस्वरूप, पूरे पठार पर 14,000 से अधिक हिमनद झीलों (glacial lakes) का निर्माण देखा गया है।
ये नवगठित और लगातार भरती हुई हिमनद झीलें एक टिक-टिक करते टाइम-बम की तरह हैं। जब भी बर्फ का कोई बड़ा टुकड़ा (एवलांच) इन झीलों में गिरता है या इनका प्राकृतिक मोराइन (Moraine) बांध कमज़ोर होकर टूटता है, तो यह ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) यानी अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लेता है। चीनी विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से बढ़ते तापमान और तिब्बती पठार पर हो रहे ग्लेशियल रिट्रीट (बर्फ के पीछे हटने) के बीच एक सीधा संबंध (clear link) स्थापित किया है।
विशेषज्ञों ने इस वैज्ञानिक सत्य को हाल ही में हुई एक भीषण भौगोलिक त्रासदी से भी जोड़ा है। उन्होंने 26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा पर हुए जानलेवा हिमनद पतन (deadly August 26 glacial collapse) को सीधे तौर पर इसी जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान का परिणाम बताया है। इस प्रलयकारी आपदा ने सीमा के दोनों ओर भारी बुनियादी ढांचे, पुलों और मानव बस्तियों को क्षण भर में नष्ट कर दिया था।
यह अध्ययन भारत, नेपाल और बांग्लादेश जैसे हिमालय के अनुप्रवाह (Downstream) वाले देशों के लिए बेहद चिंताजनक है। तिब्बती पठार से ही सिंधु, गंगा, और ब्रह्मपुत्र जैसी महाकाय नदियां निकलती हैं, जो करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं। 14,000 से अधिक हिमनद झीलों का अस्तित्व भविष्य में और अधिक ‘GLOF’ घटनाओं का साफ अंदेशा देता है। यदि कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए तत्काल वैश्विक कदम नहीं उठाए गए, तो हिमालयी क्षेत्र में आने वाले वर्षों में ऐसी जल-प्रलय की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में भारी इजाफा होगा, जिसका सामना करने के लिए शायद किसी भी देश का बुनियादी ढांचा तैयार नहीं है।