ओडिशा में भ्रष्टाचार का अनोखा मामला: सरकारी आवासीय विद्यालयों में प्रति छात्र 10 रुपये की रिश्वत मांगते ऑडिटर गिरफ्तार

विजिलेंस विभाग की बड़ी कार्रवाई, लिफाफों में रखे 14.38 लाख रुपये से अधिक नकद ज़ब्त
राघवेन्द्र प्रताप सिंह/ भुवनेश्वर: ओडिशा राज्य में शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के सरकारी दावों को तब एक बड़ा झटका लगा, जब भ्रष्टाचार निरोधक विभाग ने एक बेहद चौंकाने वाले मामले का पर्दाफाश किया। यह मामला न केवल भ्रष्टाचार की जड़ों की गहराई को दर्शाता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि सरकारी तंत्र में बैठे कुछ अधिकारी किस तरह मासूम छात्रों के नाम पर भी अवैध वसूली करने से बाज नहीं आते। एक ताज़ा और बेहद हैरान करने वाले घटनाक्रम में, सरकारी आवासीय विद्यालयों में प्रति छात्र 10 रुपये की रिश्वत मांगने के आरोप में ओडिशा के ऑडिटर गिरफ्तार किए गए हैं। यह अपने आप में एक ‘अनोखा’ और बेहद शर्मनाक मामला है जहां रिश्वत की राशि प्रति छात्र के हिसाब से तय की गई थी।
ओडिशा के सतर्कता विभाग (Vigilance Department) ने इस भ्रष्ट नेटवर्क को तोड़ने के लिए एक सटीक और गुप्त जाल बिछाया था। इस छापेमारी के दौरान बरामद की गई नकद राशि ने सभी को हैरान कर दिया है। सतर्कता विभाग ने रिश्वत की ऐसी अजीबोगरीब मांग करने के आरोपी दो ऑडिटरों के पास से लिफाफों में रखे ₹14,38,340 ज़ब्त किए हैं। इतनी बड़ी मात्रा में नकद राशि का मिलना यह साबित करता है कि यह वसूली अभियान एक लंबे समय से और बहुत ही व्यवस्थित तरीके से चलाया जा रहा था, जिसमें राज्य भर के कई आवासीय विद्यालयों को निशाना बनाया गया होगा।
सरकारी आवासीय विद्यालय विशेष रूप से समाज के वंचित और कमज़ोर वर्गों के बच्चों के लिए चलाए जाते हैं, ताकि उन्हें मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। ऐसे विद्यालयों के ऑडिट (लेखा-जोखा) के दौरान प्रति छात्र 10 रुपये का ‘कट’ या रिश्वत मांगना, सीधे तौर पर उन गरीब छात्रों के कल्याण के लिए आवंटित सरकारी धन पर डाका डालना है। 11 सितंबर, 2026 को सतर्कता विभाग द्वारा जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में इस पूरी जब्ती का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। विज्ञप्ति में कहा गया है, “इंटरसेप्शन के दौरान, उनके कब्ज़े से 52 लिफाफों और 20 खुले बंडलों में ₹5,51,510 नकद (संदिग्ध अवैध नकद) बरामद किए गए, जिसका वे संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके”।
52 लिफाफों का मिलना इस बात की ओर भी स्पष्ट इशारा करता है कि ये पैसे अलग-अलग स्कूलों या स्रोतों से एकत्र किए गए थे और इन्हें संभवतः ऊपर के अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए व्यवस्थित किया जा रहा था। जब सरकारी ऑडिटर्स ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाएंगे, तो सिस्टम में पारदर्शिता की उम्मीद किससे की जा सकती है? इस गिरफ्तारी के बाद अब ओडिशा सरकार और सतर्कता विभाग पर यह दबाव है कि वे इस पूरे ‘रिश्वत सिंडिकेट’ की गहराई से जांच करें और यह पता लगाएं कि क्या शिक्षा विभाग के अन्य उच्चाधिकारी भी इस शर्मनाक वसूली नेटवर्क का हिस्सा हैं। यह सख्त कार्रवाई भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश ज़रूर है।