अमेरिकी सांसद ने रूस प्रतिबंध अधिनियम में भारत का नाम शामिल करने के लिए पेश किया संशोधन

रूसी तेल प्रतिबंधों और ‘शैडो फ्लीट’ पर अंकुश लगाने की कोशिश, ब्रिक्स बैठक के बीच बढ़ा कूटनीतिक दबाव
अभिषेक सिंह
वाशिंगटन / नई दिल्ली
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे लंबे युद्ध के कारण वैश्विक कूटनीति में लगातार नए समीकरण और तनाव देखने को मिल रहे हैं। पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए जा रहे आर्थिक प्रतिबंधों की आंच अब सीधे तौर पर भारत जैसे तटस्थ देशों तक भी पहुंचने लगी है। एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील कूटनीतिक घटनाक्रम में, अमेरिकी संसद (U.S. lawmaker) ने रूस प्रतिबंध अधिनियम (Russia sanctions act) में भारत का नाम शामिल (naming India) करने के लिए एक संशोधन प्रस्तुत किया है। यह कदम भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर सकता है।
इस प्रस्तावित संशोधन का मुख्य उद्देश्य उन देशों और संस्थाओं पर शिकंजा कसना है जो रूसी ऊर्जा और कच्चे तेल के व्यापार को सुविधाजनक बना रहे हैं। यह कदम ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ (Lindsey O Graham Sanctioning Russia and Iran Act) के दायरे को बढ़ाने का एक प्रयास है। इस अधिनियम को पिछले महीने ही अमेरिकी सीनेट (U.S. Senate) द्वारा 86-11 के भारी बहुमत (overwhelming 86-11 vote last month) से पारित किया गया था। यह भारी बहुमत दर्शाता है कि अमेरिकी संसद में रूस और ईरान को लेकर दोनों प्रमुख पार्टियों (डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन) के बीच गहरी वैचारिक सहमति है।
इस कड़े प्रतिबंध अधिनियम का लक्ष्य केवल रूस का नेतृत्व (Russia’s leadership) और उसका ऊर्जा क्षेत्र (energy sector) ही नहीं है, बल्कि यह जहाजों के उस “शैडो फ्लीट” (“shadow fleet” of vessels) पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रयास करता है जो मास्को को तेल वितरण (oil deliveries) पर लगे प्रतिबंधों से बचने (evade sanctions) में सक्षम बनाता है। अमेरिका का आरोप है कि इस ‘शैडो फ्लीट’ (गुमनाम जहाजों का बेड़ा) का उपयोग करके रूस अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारी मात्रा में अपना कच्चा तेल बेच रहा है, जिससे उसे अपने युद्ध को वित्तपोषित करने के लिए राजस्व प्राप्त हो रहा है। भारत, जो कि हाल के वर्षों में रूसी कच्चे तेल का एक बड़ा खरीदार बनकर उभरा है, इस संशोधन के सीधे निशाने पर आ सकता है।
इस घटनाक्रम की टाइमिंग भी भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संशोधन एक ऐसे समय में सामने आया है जब हाल ही में नई दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया है। रिपोर्ट से जुड़ी तस्वीर में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russia’s President Vladimir Putin) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान एक फोटो समारोह में शामिल होते हुए देखा जा सकता है। भारत ने हमेशा से अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है। भारत का स्पष्ट मानना है कि वह अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहीं से भी कच्चा तेल खरीदने के लिए स्वतंत्र है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस प्रस्तावित संशोधन को किस हद तक लागू करता है। यदि भारत के खिलाफ किसी भी प्रकार के द्वितीयक प्रतिबंध (Secondary Sanctions) लगाए जाते हैं, तो इससे भारत-अमेरिका की मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी और ‘क्वाड’ (QUAD) जैसे गठबंधनों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। भारतीय कूटनीतिक तंत्र इस पूरे घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र बनाए हुए है और वॉशिंगटन डीसी में अपने हितों की रक्षा के लिए गहन पैरवी कर रहा है।