6 दशक पुराने भूमि हस्तांतरण मामले में फंसी प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स, महाराष्ट्र सरकार ने दिए जांच के आदेश

1960 के दशक में चरागाह भूमि का हुआ था आवंटन; अब प्रीमियम रियल एस्टेट में बदलने पर 9 सदस्यीय SIT करेगी जांच
राघवेन्द्र प्रताप सिंह
मुंबई
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और उसके आस-पास के क्षेत्रों में ज़मीन की कीमतें हमेशा से आसमान छूती रही हैं। इसी बहुमूल्य ज़मीन से जुड़ा एक बेहद पुराना और बड़ा घोटाला अब परत-दर-परत खुलने जा रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने एक कड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए छह दशक से अधिक समय पहले ‘प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स’ को किए गए एक बड़े भूमि हस्तांतरण की गहन जांच के आदेश दिए हैं। इस मामले ने महाराष्ट्र के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भारी हड़कंप मचा दिया है, क्योंकि इसमें उन नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं जो मूल रूप से औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए थे।
यह पूरा विवाद उस ज़मीन के इर्द-गिर्द घूमता है जो कभी कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हुआ करती थी। आधिकारिक जानकारी और रिपोर्टों के अनुसार, 1960 के दशक में औद्योगिक उद्देश्यों के लिए यह मवेशी चराने वाली भूमि आवंटित की गई थी। उस समय नवगठित महाराष्ट्र राज्य में औद्योगीकरण को तेज़ करने के लिए सरकारें बड़े पैमाने पर रियायती दरों पर भूमि आवंटन करती थीं। प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स को भी इसी नीति के तहत यह विशाल भूखंड सौंपा गया था ताकि वहां कारखाने लगें और रोज़गार के नए अवसर पैदा हों।
लेकिन समय के साथ-साथ इस ज़मीन का असल उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया और यह रियल एस्टेट माफियाओं और कॉरपोरेट मुनाफे की भेंट चढ़ गई। इस मामले में गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि कथित भूमि उपयोग उल्लंघन के तहत इस औद्योगिक ज़मीन को अब प्रीमियम रियल एस्टेट में बदल दिया गया है। जिन ज़मीनों पर कल-कारखाने धड़कने चाहिए थे, वहां अब गगनचुंबी रिहायशी इमारतें और महंगे कमर्शियल कॉम्प्लेक्स खड़े हो गए हैं, जिससे सरकार के खजाने को भारी नुकसान पहुंचा है।
इन गंभीर आरोपों का कड़ाई से संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार ने एक उच्च-स्तरीय जांच टीम का गठन कर दिया है। महाराष्ट्र के राजस्व विभाग ने इस पूरे घोटाले की परतें उधेड़ने के लिए कोंकण मंडलायुक्त की अध्यक्षता में एक नौ सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है। यह SIT अब उन सभी पुराने सरकारी दस्तावेज़ों, आवंटन पत्रों और राजस्व रिकॉर्ड्स को खंगालेगी जिनके आधार पर यह बेशकीमती चरागाह भूमि इतने वर्षों तक कॉरपोरेट हाथों में बनी रही और अंततः रियल एस्टेट के लिए डायवर्ट कर दी गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) में इस तरह के भूमि डायवर्जन के कई मामले हो सकते हैं, जहां उद्योगों के नाम पर ज़मीनें ली गईं और बाद में उन्हें भारी मुनाफे पर बिल्डरों को बेच दिया गया। यह एसआईटी जांच न केवल प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स के इस छह दशक पुराने मामले का सच सामने लाएगी, बल्कि यह भविष्य के लिए एक कड़ा संदेश भी होगी कि राज्य के संसाधनों और सार्वजनिक भूमि का उपयोग निजी मुनाफे के लिए नहीं किया जा सकता। जांच के नतीजे आने वाले दिनों में कई बड़े अधिकारियों और बिल्डरों की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।