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West Bengal SIR Appeals: 37 लाख से अधिक लंबित अपीलों के निपटारे में लग सकते हैं इतने साल, सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए आंकड़े, पढ़े ये रिपोर्ट

कोलकाता : पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि लाखों की संख्या में लंबित पड़ी अपीलों का फैसला आखिरकार कब तक हो पाएगा? हाल ही में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को जो आंकड़े सौंपे हैं, उन्होंने सबको चौंका दिया है. आयोग के मुताबिक, SIR से जुड़े आदेशों के खिलाफ कुल 38,20,683 अपीलें दाखिल की गई हैं, जिनमें से अभी तक सिर्फ 1,02,231 अपीलों का ही निपटारा हो सका है.37 लाख से ज्यादा अपीलें अभी भी लंबितसुप्रीम कोर्ट के विशेष निर्देशों पर इन मामलों की सुनवाई के लिए कुल 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जो अप्रैल 2026 से लगातार काम कर रहे हैं. इन ट्रिब्यूनलों ने पिछले करीब पांच महीनों (यानी 158 दिनों) में 1,02,231 मामलों का निपटारा किया है. यदि इस औसत रफ्तार (लगभग 647 अपील प्रतिदिन) को आधार बनाया जाए, तो बाकी बची 37,18,452 लंबित अपीलों को निपटाने में लगभग 5,750 दिन यानी करीब 15 साल 9 महीने का लंबा समय लग सकता है. हालांकि, यह केवल मौजूदा औसत रफ्तार पर आधारित एक गणितीय अनुमान है, और ट्रिब्यूनलों की संख्या या कार्यकुशलता बढ़ने पर यह समय काफी कम भी हो सकता है.SIR प्रक्रिया से जुड़े मुख्य आंकड़ेकुल दर्ज अपीलें: 38,20,683निपटारा हो चुकी अपीलें: 1,02,231लंबित अपीलें: 37,18,452 (लगभग 97.3 प्रतिशत मामले अभी भी बाकी)ट्रिब्यूनलों की संख्या: 19 (जो अप्रैल 2026 से सक्रिय हैं)नए फॉर्म 6 आवेदन: 17 दिसंबर 2025 से 7 अगस्त 2026 के बीच नाम जुड़वाने के लिए 34.13 लाख से अधिक नए आवेदन भी प्राप्त हुए हैं.राजनीतिक गलियारों में गरमाया मुद्दाइस पूरी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी चिंताएं और तर्क हैं. तृणमूल कांग्रेस (TMC) का कहना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी और टीएमसी के वोटों का अंतर करीब 30 लाख का था, और कई सीटों पर जीत का अंतर एसआईआर (SIR) में कटे नामों से भी कम है. वहीं, कानूनी जानकारों और वकीलों का यह भी मानना है कि जिन लोगों के नाम गलत तरीके से काटे गए हैं, उनके मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए ऐसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुना जाना चाहिए.सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और प्राथमिकताएंसुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए चुनाव आयोग से लंबित मामलों के त्वरित निपटारे और व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए उठाए जा रहे कदमों की पूरी जानकारी मांगी है. अदालत ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि जिन मामलों में मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर तत्काल सुनवाई की जरूरत है, उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन न हो.