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केरल की राजनीति में भारी भूचाल: सीएमआरएल-एक्सालॉजिक भुगतान मामले में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पर लटकी गिरफ्तारी की तलवार

विवेक ओझा
तिरुवनंतपुरम

दक्षिण भारत के अत्यंत साक्षर और राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य केरल में एक ऐसा अप्रत्याशित राजनीतिक और प्रशासनिक भूचाल आया है, जिसने राज्य की सत्ताधारी वामपंथी सरकार की नींव को पूरी तरह से हिला कर रख दिया है। राज्य के सर्वोच्च पद पर आसीन मुख्यमंत्री और उनके परिवार के सदस्य एक अत्यंत गंभीर वित्तीय घोटाले के केंद्र में आ गए हैं। इस बहुचर्चित ‘सीएमआरएल-एक्सालॉजिक भुगतान मामले’ (CMRL-Exalogic pay-off case) में एक बहुत बड़ा कानूनी और वैधानिक मोड़ आ गया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, केरल के महाधिवक्ता ने पिनाराई, उनकी बेटी वीणा और रियास के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने की सिफारिश की है।

यह मामला कोचीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड (सीएमआरएल) नामक एक निजी खनन कंपनी और मुख्यमंत्री की पुत्री वीणा विजयन के स्वामित्व वाली आईटी फर्म ‘एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस’ के बीच हुए संदिग्ध वित्तीय लेन-देन से संबंधित है। आरोप है कि बिना कोई वास्तविक सॉफ्टवेयर या आईटी सेवा प्रदान किए, सीएमआरएल द्वारा एक्सालॉजिक को करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया। इसे स्पष्ट रूप से राजनीतिक संरक्षण के बदले दी गई अवैध रिश्वत या ‘पे-ऑफ’ के रूप में देखा जा रहा है।

इस अत्यंत संवेदनशील मामले में राज्य के शीर्ष कानूनी अधिकारी का हस्तक्षेप स्थिति की गंभीरता को प्रमाणित करता है। ऐसा समझा जाता है कि महाधिवक्ता के. जाजू बाबू ने रिपोर्ट में नामित सभी लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की सलाह दी है। महाधिवक्ता ने केवल प्राथमिकी दर्ज करने तक ही सीमित न रहकर, इस मामले में सबसे कड़े कानूनों को लागू करने का भी परामर्श दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के कड़े प्रावधानों को लागू करने की सलाह दी है। एक राज्य के महाधिवक्ता द्वारा स्वयं के ही राज्य के मुख्यमंत्री और उनके परिवार के विरुद्ध भ्रष्टाचार के इतने गंभीर आरोपों में मुकदमा दर्ज करने की सिफारिश करना, भारतीय राजनीति में एक अत्यंत विरल और ऐतिहासिक घटना है।

तस्वीर में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को गंभीर मुद्रा में देखा जा सकता है, जो उनके समक्ष उत्पन्न हुए इस विशाल राजनीतिक और वैधानिक संकट को भली-भांति दर्शाता है। रियास, जो कि मुख्यमंत्री के दामाद और राज्य मंत्रिमंडल में एक प्रमुख मंत्री हैं, उनका नाम भी इस घोटाले में शामिल होने से सरकार की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंची है। विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ और भारतीय जनता पार्टी, अब मुख्यमंत्री के तत्काल इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं।

इस सिफारिश के पश्चात अब राज्य की जांच एजेंसियों पर भारी दबाव है कि वे बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के निष्पक्ष रूप से प्राथमिकी दर्ज करें और त्वरित जांच आरंभ करें। यह घटनाक्रम न केवल वामपंथी सरकार के ‘भ्रष्टाचार-मुक्त सुशासन’ के दावों की धज्जियां उड़ाता है, बल्कि यह आगामी चुनावों में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के लिए एक विनाशकारी झटका साबित हो सकता है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों का इस प्रकार के कॉरपोरेट घोटालों में लिप्त पाया जाना लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक है। अब संपूर्ण राज्य की दृष्टि इस बात पर टिकी है कि मुख्यमंत्री इस कानूनी और नैतिक संकट का सामना कैसे करते हैं और क्या वे अपने पद से त्यागपत्र देकर जांच का सामना करने का साहस दिखाएंगे।