तृणमूल कांग्रेस के ऐतिहासिक चुनाव चिह्न पर निर्वाचन आयोग की रोक के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय पहुंचीं ममता बनर्जी

अयोग्यता का सामना कर रहे दागी और विद्रोही विधायकों के बयानों पर भरोसा करने का निर्वाचन आयोग पर लगाया अत्यंत गंभीर आरोप
विवेक ओझा
नई दिल्ली / कोलकाता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे सबसे बड़े और नाटकीय सत्ता संघर्ष ने अब देश की सबसे बड़ी न्यायिक चौखट पर अपनी दस्तक दे दी है। राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और राजनीतिक दिग्गज ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के अस्तित्व और उसके बहुचर्चित चुनाव चिह्न को बचाने के लिए एक बहुत बड़ा, साहसिक और निर्णायक कानूनी कदम उठाया है। प्राप्त आधिकारिक समाचारों और प्रतिवेदनों के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न को ज़ब्त किए जाने के कड़े फैसले के खिलाफ देश के सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है। उन्नीस सितंबर, दो हज़ार छब्बीस को नई दिल्ली से प्रकाशित इस रिपोर्ट ने राष्ट्रीय राजनीति में भारी हलचल पैदा कर दी है।
तृणमूल कांग्रेस, जो दशकों से पश्चिम बंगाल की राजनीति का निर्विवाद पर्याय रही है, वर्तमान में एक भयंकर और अभूतपूर्व आंतरिक विभाजन का सामना कर रही है। पार्टी के दो गुटों के बीच पार्टी के मूल नाम और उसके लोकप्रिय चुनाव चिह्न पर अपना-अपना प्रबल दावा पेश करने के कारण निर्वाचन आयोग ने हाल ही में चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से ज़ब्त (स्थगित) करने का आदेश दिया था। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग के इसी फैसले को पूरी तरह से असंवैधानिक और अनुचित करार देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक विस्तृत याचिका दायर की है।
सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई इस अत्यंत महत्वपूर्ण याचिका में निर्वाचन आयोग की संपूर्ण कार्यप्रणाली और उसकी निर्णय प्रक्रिया पर अत्यंत गंभीर और तीखे सवाल उठाए गए हैं। याचिका में बहुत ही स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत के निर्वाचन आयोग ने अपना यह कठोर निर्णय उन विद्रोही विधायकों के आधारहीन बयानों पर भरोसा करते हुए लिया है, जो स्वयं दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। याचिका में इस बात पर विशेष और कानूनी बल दिया गया है कि संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्यता की तलवार का सामना कर रहे विधायकों के दावों को पार्टी के बहुमत का ठोस आधार नहीं माना जा सकता है।
यह वैधानिक और कानूनी तर्क अत्यंत सशक्त है। ममता बनर्जी के अधिवक्ताओं का यह तर्क है कि जो विधायक पार्टी के आधिकारिक दिशा-निर्देशों (व्हिप) का घोर उल्लंघन कर चुके हैं और जिनकी विधानसभा सदस्यता स्वयं अत्यंत खतरे में है, वे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे या उसके मूल चुनाव चिह्न पर अपना दावा कैसे पेश कर सकते हैं? निर्वाचन आयोग द्वारा ऐसे दागी और असंतुष्ट विधायकों के बयानों को आधार बनाकर पूरी पार्टी के ऐतिहासिक चुनाव चिह्न को ज़ब्त कर लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के भी घोर विरुद्ध है।
पश्चिम बंगाल में आगामी उपचुनावों और राज्य के समग्र राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए पार्टी के चुनाव चिह्न का यह विवाद अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। भारत की विशाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में, विशेषकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में, मतदाता अपने नेता को पार्टी के चुनाव चिह्न से ही सबसे अधिक पहचानते हैं। चुनाव चिह्न छिन जाने से किसी भी स्थापित राजनीतिक दल को चुनाव प्रचार में भारी और अपूरणीय नुकसान उठाना पड़ता है। ममता बनर्जी का यह सर्वोच्च न्यायालय में जाना यह सिद्ध करता है कि वह अपनी राजनीतिक विरासत को इतनी आसानी से विद्रोही गुट या निर्वाचन आयोग के किसी एकतरफा फैसले के हाथों छिनने नहीं देंगी। अब देश की सबसे बड़ी अदालत के समक्ष यह एक अत्यंत जटिल संवैधानिक प्रश्न खड़ा हो गया है जिसका समाधान भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा।