आंध्र प्रदेश में प्रदूषण की शिकायत करने वाले किसान पर इथेनॉल निर्माता कंपनी का एक करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा

राघवेन्द्र प्रताप सिंह
एनटीआर जिला (आंध्र प्रदेश) : भारत में औद्योगीकरण और पर्यावरण संरक्षण के मध्य अक्सर एक गहरा और जटिल संघर्ष देखने को मिलता है। जब ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े कारखाने स्थापित होते हैं, तो स्थानीय किसानों को उनके द्वारा फैलाए जाने वाले प्रदूषण और जल संकट का सीधा खामियाजा भुगतना पड़ता है। आंध्र प्रदेश राज्य से एक ऐसा ही अत्यंत संवेदनशील और विचलित करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक विशाल कॉरपोरेट संस्था ने एक आम किसान की आवाज़ को दबाने के लिए कानूनी दांव-पेच का सहारा लिया है। आधिकारिक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, एक इथेनॉल निर्माता कंपनी ने प्रदूषण के आरोपों को लेकर आंध्र प्रदेश के एक किसान पर एक करोड़ रुपये का भारी-भरकम मुकदमा दायर किया है। एक निर्धन किसान पर इतनी विशाल धनराशि का मानहानि का दावा करना स्पष्ट रूप से उसे डराने और चुप कराने का एक प्रयास प्रतीत होता है।इस पूरे कानूनी और पर्यावरणीय विवाद के केंद्र में एक स्थानीय किसान और उनका गांव है, जो लंबे समय से अपने अस्तित्व और स्वच्छ पर्यावरण की लड़ाई लड़ रहा है। यह कानूनी मुकदमा एनटीआर जिले के गांधीपल्ली के रहने वाले एम. मुरलीधर रेड्डी के ‘भ्रामक’ बयानों पर माफी और उन पर रोक लगाने की मांग करता है। कंपनी का आरोप है कि किसान द्वारा लगाए गए प्रदूषण के आरोप निराधार हैं और इससे उनकी व्यावसायिक छवि खराब हो रही है। परंतु, इस मामले की पृष्ठभूमि और पूर्व में की गई सरकारी जांचों के परिणाम किसान के दावों की सत्यता को बल प्रदान करते हैं। सरकारी एजेंसियों ने अतीत में इस कारखाने की कार्यप्रणाली में भारी खामियां पाई थीं। रिपोर्ट में इस तथ्य का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि एक लोकायुक्त जांच में सिंचाई नहर में अनुपचारित अपशिष्ट (बिना साफ किया हुआ गंदा पानी) बहने की बात सामने आई थी। कृषि प्रधान क्षेत्र में सिंचाई की नहर में जहरीला रसायन छोड़ना न केवल फसलों को नष्ट करता है, बल्कि यह पूरे पारिस्थितिक तंत्र और भूजल को भी बुरी तरह से प्रदूषित कर देता है। इस घोर लापरवाही के प्रमाणित होने के पश्चात, आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एपीपीसीबी) ने भी सख्त कदम उठाते हुए कंपनी पर भारी जुर्माना लगाया था।इन सरकारी कार्रवाइयों के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर किसानों की समस्याएं कम नहीं हुई हैं। यह कोई रातों-रात उपजा विवाद नहीं है, बल्कि यह एक लंबे संघर्ष का परिणाम है। गांधीपल्ली गांव के किसानों ने इस कारखाने के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन किए हैं, जो वर्ष दो हज़ार आठ में स्थापित होने के बाद से इथेनॉल और अन्य उप-उत्पादों का निरंतर उत्पादन कर रहा है[cite: 102]। संलग्न चित्र में एक किसान को प्रदूषित जल के पास असहाय खड़े देखा जा सकता है, जो उस क्षेत्र में प्रदूषण की भयावहता और कृषि भूमि के हो रहे विनाश को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। एक ओर सरकारें पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय दोगुनी करने के बड़े-बड़े दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर जब किसान अपने खेतों को ज़हरीले रसायनों से बचाने के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो उन्हें कॉरपोरेट मुकदमों के बोझ तले दबा दिया जाता है। एम. मुरलीधर रेड्डी पर किया गया यह एक करोड़ का मुकदमा न्यायपालिका और नागरिक समाज के लिए एक परीक्षण है कि क्या देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार केवल कागजों तक ही सीमित है, या एक आम किसान भी बड़े उद्योगपतियों के विरुद्ध अपने अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा हो सकता है।