प्रधानमंत्री की डिग्री का मामला: गुजरात हाई कोर्ट ने खारिज की केजरीवाल की अपील, 25000 का जुर्माना बरकरार

राघवेंद्र प्रताप सिंह
प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े विवाद में आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को अदालत से बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को सही ठहराते हुए सूचना आयोग के पुराने आदेश को रद्द रखा है और जुर्माने की राशि भी कायम रखी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से जुड़े बहुचर्चित मामले में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को गुजरात हाई कोर्ट से कोई कानूनी राहत नहीं मिली है। मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की खंडपीठ ने मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए केजरीवाल की उस अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने एकल पीठ के फैसले को चुनौती दी थी। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि एकल पीठ द्वारा दिए गए निर्णय और उसके निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई भी कानूनी आधार या त्रुटि नहीं पाई गई है। इस फैसले के साथ ही अदालत ने केजरीवाल पर लगाए गए पच्चीस हजार रुपये के जुर्माने को भी बरकरार रखा है, जिसे उन्हें कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग के हर्जाने के तौर पर चुकाना होगा।
यह पूरा कानूनी विवाद साल दो हजार सोलह का है, जब केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने अरविंद केजरीवाल के एक पत्र का संज्ञान लेते हुए गुजरात विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री की डिग्रियों की जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था। इस आदेश के खिलाफ गुजरात विश्वविद्यालय ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पिछले साल इकतीस मार्च को हाई कोर्ट की एकल पीठ ने सूचना आयोग के उस आदेश को रद्द करते हुए केजरीवाल पर पच्चीस हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। अदालत ने उस समय कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून का उद्देश्य जनहित की जानकारी मांगना है, न कि अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने या उनका उपहास उड़ाने के लिए इस प्रणाली का अनुचित इस्तेमाल करना। एकल पीठ के इसी फैसले को अब खंडपीठ ने भी पुख्ता कर दिया है।
अपील की सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी थी कि उन्होंने कभी भी सूचना आयोग में कोई औपचारिक आवेदन दाखिल नहीं किया था, बल्कि आयोग ने केवल उनके एक पत्र को आधार मानकर खुद ही कार्यवाही शुरू कर दी थी। उनका यह भी तर्क था कि चूंकि यह मामला जनहित से जुड़ा है, इसलिए उन पर जुर्माना लगाना न्यायसंगत नहीं है। दूसरी ओर, गुजरात विश्वविद्यालय की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने इन दलीलों का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि केजरीवाल ने इस मुद्दे को लगातार तूल दिया और संस्था की छवि को खराब करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस भी कीं। विश्वविद्यालय प्रशासन का यह भी कहना था कि प्रधानमंत्री की स्नातकोत्तर की डिग्री पहले से ही सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध है, इसके बावजूद बेवजह यह कानूनी विवाद खड़ा किया गया। अदालत ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अंततः विश्वविद्यालय के तर्कों को सही माना और पुरानी व्यवस्था को बहाल रखा।