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‘जीविका दीदियों’ का कमाल: 42 लाख महिलाएं आधुनिक खेती से जुड़ीं, लखपति दीदी से लेकर ‘रानी मिस्त्री’ तक बनाई पहचान

सरिता त्रिपाठी

बिहार में ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने वाले ‘जीविका’ कार्यक्रम ने सफलता के 20 साल पूरे कर लिए हैं। इस पहल से जुड़कर लाखों महिलाएं न सिर्फ आधुनिक खेती कर रही हैं, बल्कि ‘रानी मिस्त्री’ बनकर पारंपरिक बंधनों को तोड़ते हुए आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं।

बिहार के ग्रामीण अंचलों में महिलाओं के सशक्तिकरण और आर्थिक स्वावलंबन को लेकर एक बेहद शानदार और प्रेरक बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य में महिलाओं की तकदीर और गांवों की तस्वीर बदलने वाले महत्वाकांक्षी ‘जीविका’ कार्यक्रम ने अपनी सफलता के 20 साल पूरे कर लिए हैं। पटना स्थित राज्य ब्यूरो से मिली जानकारी के अनुसार, वर्ष 2006 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के शुभ अवसर पर शुरू हुई ‘जीविका’ यानी बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसाइटी (बीआरएलपीएस) की यह पहल शुक्रवार को अपने दो दशक पूरे कर रही है। इन 20 सालों की निरंतर और संघर्षपूर्ण यात्रा ने ग्रामीण महिलाओं को घरों की चारदीवारी से बाहर निकालकर आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इस दौरान ग्रामीण महिलाओं ने जीविका समूह से जुड़कर स्वावलंबन और सफलता की एक नई कहानी लिखी है।

इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही है कि इसने ग्रामीण महिलाओं को पारंपरिक दायरों से निकालकर आधुनिक रोजगार, तकनीक और स्वरोजगार से जोड़ा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस शानदार पहल के माध्यम से अब तक लगभग 42 लाख महिलाएं आधुनिक खेती के तौर-तरीकों से सीधे तौर पर जुड़ चुकी हैं। ये महिलाएं अब केवल खेतों में साधारण मजदूरी करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उन्नत कृषि तकनीकों और बेहतर फसल प्रबंधन का उपयोग करके कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति ला रही हैं। खेती और अन्य स्वरोजगार के माध्यम से अपनी आय में भारी वृद्धि करके ये लाखों महिलाएं अब गर्व के साथ ‘लखपति दीदी’ बन गई हैं। ‘लखपति दीदी’ की यह पहचान उनके कड़े संघर्ष, मेहनत और जीविका कार्यक्रम द्वारा दिए गए सही मार्गदर्शन का सीधा परिणाम है, जिसने उन्हें गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकाला है।

आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ इन जीविका दीदियों ने सामाजिक रूढ़ियों और सदियों पुराने पारंपरिक बंधनों को तोड़ने का भी अद्भुत साहस दिखाया है। आमतौर पर भवन निर्माण और राजमिस्त्री का काम केवल पुरुषों के वर्चस्व वाला क्षेत्र माना जाता रहा है, लेकिन बिहार की इन साहसी महिलाओं ने इस मिथक को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। ‘रानी मिस्त्री’ बनकर ये महिलाएं अब पारंपरिक बंधनों को बड़ी मजबूती से तोड़ रही हैं। ‘रानी मिस्त्री’ के रूप में ये महिलाएं न केवल निर्माण कार्यों में अपना लोहा मनवा रही हैं, बल्कि अपने इस बेमिसाल कौशल से समाज की पुरानी सोच को भी बदल रही हैं।

दो दशक की इस निरंतर और सफल यात्रा ने वास्तव में बिहार के गांवों की पूरी तस्वीर बदल कर रख दी है। 20 साल पहले जिस पहल की शुरुआत कुछ महिलाओं के छोटे समूहों के साथ हुई थी, वह आज बिहार में एक विशाल जन आंदोलन का रूप ले चुकी है। ‘जीविका दीदियों’ का यह कमाल यह साबित करता है कि यदि महिलाओं को सही अवसर, उचित मंच और थोड़ा सा प्रोत्साहन मिले, तो वे न केवल अपने परिवार को बल्कि पूरे राज्य की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती हैं।