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भारतीय निर्यातकों को वैश्विक संकट के बीच बड़ा संबल: केंद्र सरकार ने RoDTEP योजना की अवधि 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ाई

सरिता त्रिपाठी

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और लाल सागर (Red Sea) संकट के कारण उत्पन्न वैश्विक लॉजिस्टिक्स चुनौतियों के बीच, भारत सरकार ने देश के निर्यात क्षेत्र को मजबूती देने के लिए एक निर्णायक कदम उठाया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने ‘निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों की छूट’ (RoDTEP) योजना की समयसीमा को 31 दिसंबर 2026 तक विस्तारित करने की आधिकारिक घोषणा की है। सरकार का यह फैसला ऐसे नाजुक समय पर आया है जब दुनिया भर में शिपिंग फ्रेट की बढ़ती दरें और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएं भारतीय निर्यातकों के मार्जिन पर गहरा दबाव बना रही थीं।

RoDTEP योजना, जिसे जनवरी 2021 में पुरानी MEIS योजना के स्थान पर विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के अनुरूप तैयार किया गया था, भारतीय विनिर्माण को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने का मुख्य आधार है। इस योजना का मूल सिद्धांत यह है कि ‘वस्तुओं का निर्यात होना चाहिए, करों का नहीं’। इसके तहत केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर लगने वाले उन सभी अंतर्निहित करों, शुल्कों और उपकरों (जैसे बिजली शुल्क, वैट, मंडी टैक्स और ईंधन उपकर) की प्रतिपूर्ति की जाती है, जिन्हें जीएसटी या अन्य किसी छूट तंत्र के तहत वापस नहीं लिया जा सकता। यह राशि निर्यातकों को डिजिटल लेजर में क्रेडिट स्क्रिप्स के रूप में वापस मिलती है, जिसका उपयोग वे बुनियादी सीमा शुल्क चुकाने या अन्य व्यापारियों को बेचने के लिए कर सकते हैं।

योजना के विस्तार से इंजीनियरिंग उत्पाद, वस्त्र, परिधान, रसायन, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि और समुद्री खाद्य उत्पादों जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों को तत्काल वित्तीय लिक्विडिटी मिलेगी। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स (FIEO) और प्रमुख निर्यात संवर्धन परिषदों ने सरकार के इस समयबद्ध निर्णय का जोरदार स्वागत किया है। उद्योग जगत के प्रतिनिधियों का कहना है कि वैश्विक मांग में सुस्ती और लंबे समुद्री मार्गों (केप ऑफ गुड होप रूट) के कारण बढ़ी परिवहन लागत के बीच, इस नीतिगत निरंतरता से निर्यातकों को अपने विदेशी खरीदारों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंध तय करने में भारी आत्मविश्वास मिलेगा।

वाणिज्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, यह विस्तार न केवल वर्तमान वैश्विक उथल-पुथल से भारतीय कंपनियों की रक्षा करेगा, बल्कि वर्ष 2030 तक 2 ट्रिलियन डॉलर के कुल निर्यात लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। सरकार का स्पष्ट विज़न है कि स्थानीय स्तर पर बने उत्पादों की लागत को युक्तिसंगत बनाकर भारतीय विनिर्माण को चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले विश्व बाज़ार में बढ़त दिलाई जाए।