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हिंद महासागर में भारत-फ्रांस की रणनीतिक जुगलबंदी: 24वां संयुक्त नौसैनिक अभ्यास ‘वरुण’ संपन्न, INS त्रिशूल ने दिखाई ताकत

विवेक ओझा

नई दिल्ली/तटीय कमान: वैश्विक समुद्री सुरक्षा, खुले समुद्री मार्गों और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के साझा संकल्प को दोहराते हुए भारत और फ्रांस की नौसेनाओं के बीच 24वां द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास ‘वरुण’ (VARUNA-2026) सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है। इस उच्च-स्तरीय अभ्यास में भारतीय नौसेना के स्वदेशी गाइडेड मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट ‘आईएनएस त्रिशूल’ (INS Trishul) ने भाग लेकर अपनी मारक क्षमता और तकनीकी परिपक्वता का शानदार प्रदर्शन किया। वहीं, फ्रांसीसी नौसेना की ओर से अग्रिम पंक्ति के युद्धपोत, समुद्री टोही विमान और पनडुब्बियों ने युद्धाभ्यास में अपनी सहभागिता दर्ज कराई।

वर्ष 1993 में शुरू हुआ यह नौसैनिक सहयोग 2001 में ‘वरुण’ नाम से औपचारिक रूप से स्थापित हुआ था और आज यह भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी का सबसे मजबूत स्तंभ बन चुका है। इस 24वें संस्करण का उद्देश्य दोनों नौसेनाओं के बीच अंतर-संचालनीयता (Interoperability) को और अधिक परिष्कृत करना, संयुक्त युद्धक क्षमताओं को निखारना और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता को अक्षुण्ण बनाए रखना था। बहु-चरणीय इस अभ्यास में समुद्र के भीतर, सतह पर और हवा में होने वाली जटिल सैन्य कार्रवाइयों को यथार्थवादी परिदृश्यों में परखा गया।

अभ्यास के दौरान दोनों देशों के युद्धपोतों ने उन्नत सामरिक युद्धाभ्यास, पनडुब्बी रोधी युद्ध (Anti-Submarine Warfare), वायु रक्षा अभ्यास (Air Defence Drills), सतह पर लाइव-फायरिंग और जटिल क्रॉस-डेक हेलीकॉप्टर संचालन को अंजाम दिया। दोनों नौसेनाओं के विशेष बलों (मरीन कमांडो) ने समुद्री डकैती रोधी और सर्च एंड सीज़र ऑपरेशनों का साझा अभ्यास किया। इस युद्धाभ्यास में संचार प्रणालियों और सामरिक सूचनाओं के सुरक्षित आदान-प्रदान पर विशेष जोर दिया गया, जिससे किसी भी आपात स्थिति में दोनों देश एक संयुक्त कार्यबल के रूप में त्वरित प्रतिक्रिया दे सकें।

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, लाल सागर से लेकर मलक्का जलडमरूमध्य तक बढ़ते समुद्री खतरों, पायरेसी और क्षेत्रीय तनावों के मद्देनजर भारत-फ्रांस की यह नौसैनिक एकजुटता बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच हुए ऐतिहासिक लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज एग्रीमेंट के तहत भारतीय और फ्रांसीसी नौसेनाएं एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों और बंदरगाहों का उपयोग रसद और ईंधन के लिए कर सकती हैं। आईएनएस त्रिशूल के इस सफल मिशन ने साबित किया है कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत बने भारतीय युद्धपोत दुनिया की सबसे आधुनिक नौसेनाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर किसी भी वैश्विक समुद्री चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।