संकटग्रस्त गोडावण को नया जीवन: जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में दो नर ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ प्राकृतिक आवास में छोड़े गए

विवेक ओझा
जैसलमेर/नई दिल्ली: भारत के अत्यंत दुर्लभ और विलुप्ति की कगार पर खड़े राज्य पक्षी ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (गोडावण) के संरक्षण के इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की गई है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा राजस्थान वन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में जैसलमेर स्थित डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) के प्राकृतिक आवास में दो कैप्टिव-ब्रीड (कृत्रिम प्रजनन केंद्र में पले-बढ़े) नर गोडावण को सफलतापूर्वक खुले जंगल में छोड़ा गया है। भारत में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में यह अपनी तरह का पहला और बेहद साहसिक प्रयोग है, जो इस संकटग्रस्त प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने की उम्मीदों को नई संजीवनी देता है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Ardeotis nigriceps) को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में ‘गंभीर रूप से संकटग्रस्त’ (Critically Endangered) श्रेणी में रखा गया है। वर्तमान में दुनिया भर में इनकी कुल आबादी मात्र 150 के आसपास सिमट कर रह गई है, जिसमें से 90 प्रतिशत से अधिक पक्षी राजस्थान के थार रेगिस्तान में ही पाए जाते हैं। भारी शरीर और सीमित दृश्य परिधि (Narrow Frontal Vision) के कारण यह पक्षी उड़ते समय बिजली के तारों को समय रहते नहीं देख पाते, जिसके चलते हाई-टेंशन ट्रांसमिशन लाइनों से टकराना इनकी अकाल मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन गया था। इसके अतिरिक्त अनियंत्रित शिकार और घास के मैदानों (Grasslands) के सिमटने से इनकी संख्या तेज़ी से घटी थी।
इस विनाशकारी स्थिति को पलटने के लिए वर्ष 2019 में जैसलमेर के सम में एक समर्पित ‘कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर’ की स्थापना की गई थी। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के वैज्ञानिकों ने जंगलों से गोडावण के अंडों को सुरक्षित लाकर इनक्यूबेटर में सेहने, चूजों के पोषण और उनकी चिकित्सा देखभाल की एक जटिल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। आज उसी वैज्ञानिक तपस्या का परिणाम है कि केंद्र में तैयार किए गए दो वयस्क नर पक्षियों को पूरी तरह स्वस्थ पाए जाने के बाद खुले जंगल में छोड़ने का फैसला लिया गया।
जंगल में छोड़ने से पहले दोनों पक्षियों को एक विशेष ‘सॉफ्ट-रिलीज़ एन्क्लोज़र’ में रखा गया ताकि वे प्राकृतिक परिवेश के तापमान, हवा और खुले आसमान के अनुकूल हो सकें। इसके साथ ही, दोनों पक्षियों की पीठ पर सोलर पावर्ड अत्यधिक हल्के जीपीएस-जीएसएम सैटेलाइट ट्रांसमीटर (Satellite Tags) लगाए गए हैं। वन विभाग और वैज्ञानिकों की एक विशेष टीम 24 घंटे उनकी आवाजाही, उड़ान के पैटर्न, चारे की तलाश और स्थानीय शिकारी जानवरों से उनके बचाव की रियल-टाइम निगरानी कर रही है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहता है, तो आगामी महीनों में अन्य मादा गोडावणों को भी जंगल में छोड़ा जाएगा, जिससे थार के इस गौरवशाली पक्षी की प्राकृतिक प्रजनन क्षमता को दोबारा बहाल किया जा सकेगा।