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चेन्नई के भीषण पेयजल संकट के समाधान हेतु तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों की अहम बैठक, कृष्णा नदी के जल बंटवारे पर होगी सघन चर्चा

मुख्यमंत्री बनने के पश्चात विजय का पहला आंध्र प्रदेश दौरा; जलाशयों में कम जल भंडारण के कारण ‘तेलुगु गंगा समझौते’ के तहत आंशिक जल आपूर्ति होने की प्रबल संभावना

विवेक ओझा | द इंडियन व्यू
विजयवाड़ा

दक्षिण भारत के दो प्रमुख राज्यों, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मध्य जल बंटवारे को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कूटनीतिक और प्रशासनिक बैठक संपन्न होने जा रही है। मंगलवार, तेरह अक्टूबर दो हज़ार छब्बीस को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के बीच विजयवाड़ा में एक उच्च स्तरीय बैठक होने वाली है। इस बहुप्रतीक्षित और अहम बैठक में ‘तेलुगु गंगा परियोजना’ के अंतर्गत चेन्नई महानगर को कृष्णा नदी के जल की आपूर्ति का मुद्दा सबसे प्रमुखता से उठाए जाने की पूरी संभावना है। राज्य का सर्वोच्च पद (मुख्यमंत्री) ग्रहण करने के पश्चात मुख्यमंत्री विजय की आंध्र प्रदेश की यह पहली आधिकारिक यात्रा है। यह यात्रा न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से बल्कि लाखों नागरिकों के जीवन और बुनियादी आवश्यकताओं के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

वर्तमान समय में दोनों ही राज्य अपनी जल-साझाकरण (जल बंटवारे की) प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए भारी संघर्ष कर रहे हैं, जिसका मुख्य कारण दोनों राज्यों के प्रमुख जलाशयों के जल स्तर में आई भारी गिरावट है। इस उच्च स्तरीय बैठक की आधिकारिक कार्यसूची (कार्य-योजना) में यद्यपि प्रस्तावित गोदावरी-कृष्णा-कावेरी नदी-जोड़ो परियोजना को भी प्रमुख रूप से शामिल किया गया है, तथापि तमिलनाडु सरकार के लिए सबसे तात्कालिक और गंभीर चिंता चेन्नई में पेयजल आपूर्ति में आ रही भारी कमी है। चेन्नई महानगर लंबे समय से अपनी पेयजल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पूरी तरह से अपने पड़ोसी राज्यों से मिलने वाले जल पर ही निर्भर रहा है, और ऐसे विषम समय में कृष्णा नदी का जल वहां के निवासियों के लिए एक अमूल्य जीवन रेखा के समान है।

चेन्नई को जल उपलब्ध कराने वाली ‘तेलुगु गंगा परियोजना’ का इतिहास अत्यंत पुराना है और यह दोनों राज्यों के आपसी सहयोग का एक उत्कृष्ट प्रतीक रहा है। वर्ष उन्नीस सौ तिरासी (1983) के ऐतिहासिक ‘तेलुगु गंगा समझौते’ के अंतर्गत, प्रतिवर्ष पंद्रह टीएमसी (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) जल तमिलनाडु की सीमा पर पहुंचाया जाना पूर्णतः निर्धारित है। यह समझौता दोनों राज्यों के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के मध्य हुआ था ताकि चेन्नई के निवासियों की प्यास बुझाई जा सके। परंतु, प्राकृतिक कारणों, मानसून की अनिश्चितता और कम वर्षा के चलते इस वर्ष जल आपूर्ति की स्थिति अत्यंत चुनौतीपूर्ण और चिंताजनक बनी हुई है।

आंध्र प्रदेश के प्रमुख जल स्रोतों और जलाशयों की वर्तमान दयनीय स्थिति को देखते हुए पूरा निर्धारित पंद्रह टीएमसी जल छोड़ पाना व्यावहारिक और तकनीकी रूप से लगभग असंभव प्रतीत हो रहा है। आधिकारिक सूत्रों का स्पष्ट रूप से कहना है कि श्रीशैलम, सोमशिला और कंडलेरु जैसे प्रमुख जलाशयों में जल का भंडारण अत्यंत कम है। इन अति-महत्वपूर्ण जलाशयों में पानी की भारी कमी के कारण, सूत्रों के अनुसार, जल की ‘आंशिक रिहाई’ (कम मात्रा में जल छोड़ना) ही दोनों राज्यों के बीच संभावित समझौता हो सकता है। आंध्र प्रदेश सरकार अपनी स्वयं की सिंचाई आवश्यकताओं और स्थानीय नागरिकों की पेयजल आपूर्ति को पूरी तरह से अनदेखा करके सारा जल दूसरे राज्य को हस्तांतरित नहीं कर सकती है। अतः, जलाशयों में उपलब्ध जल के अनुपात में ही चेन्नई के लिए पानी छोड़ने पर सहमति बन सकती है।

चेन्नई महानगर में उत्पन्न इस भयंकर पेयजल संकट का त्वरित और सुलभ समाधान खोजना तमिलनाडु सरकार के लिए इस समय की सबसे बड़ी और जटिल चुनौती बन गया है। गोदावरी-कृष्णा-कावेरी नदियों को जोड़ने की विशाल और महात्वाकांक्षी परियोजना भविष्य में दक्षिण भारत के इस स्थायी जल संकट का एक दीर्घकालिक समाधान अवश्य प्रस्तुत कर सकती है, परंतु वर्तमान स्थिति और तात्कालिक संकट से निपटने के लिए मुख्यमंत्री विजय को मुख्यमंत्री नायडू के साथ मिलकर एक त्वरित और व्यावहारिक मार्ग खोजना ही होगा। यह बैठक न केवल दोनों राज्यों के निवासियों की प्यास बुझाने की दृष्टि से, बल्कि दो पड़ोसी राज्यों के मध्य सहयोगात्मक संघवाद की भावना को सुदृढ़ करने के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगी।