पूर्व लोकसभा अध्यक्ष शिवराज वी. पाटिल की जयंती पर संसद में दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि: ओम बिरला ने संसदीय परंपराओं में उनके योगदान को सराहा

अभिषेक सिंह | द इंडियन व्यू
नई दिल्ली: देश के संसदीय इतिहास में उच्च मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की मिसाल कायम करने वाले पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और वरिष्ठ राजनेता श्री शिवराज वी. पाटिल की जयंती के अवसर पर संसद भवन के ऐतिहासिक संविधान सदन (सेंट्रल हॉल) में एक गरिमामय श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने संसद भवन में स्थापित श्री शिवराज पाटिल के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर राष्ट्र की ओर से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर कई केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों, पूर्व सांसदों और संसद सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इस अवसर पर कहा कि श्री शिवराज वी. पाटिल एक असाधारण विधिवेत्ता, उत्कृष्ट सांसद और एक अत्यंत संयमित पीठासीन अधिकारी थे। उन्होंने अपने पांच दशकों से अधिक लंबे सार्वजनिक जीवन में संसदीय मर्यादा, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को सदैव सर्वोच्च प्राथमिकता दी। दसवीं लोकसभा (1991 से 1996) के दौरान जब देश एक अभूतपूर्व आर्थिक और राजनीतिक संक्रमण काल से गुजर रहा था, तब उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के रूप में जिस कुशलता और धैर्य के साथ सदन का संचालन किया, वह आज भी संसदीय परंपराओं के अध्ययन का एक आदर्श उदाहरण माना जाता है।
संसदीय लोकतंत्र को पारदर्शी और जन-सुलभ बनाने में शिवराज पाटिल के योगदान को याद करते हुए वक्ताओं ने रेखांकित किया कि उन्हीं के कार्यकाल में संसद की कार्यवाही के सीधे प्रसारण (Live Telecast) की ऐतिहासिक शुरुआत हुई थी। इसके अतिरिक्त, संसदीय कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने के लिए विभाग-संबंधित स्थायी समितियों (Departmentally Related Standing Committees) की आधुनिक प्रणाली को मूर्त रूप देने में उनकी अग्रणी भूमिका रही थी। वे मानते थे कि संसद केवल बहसों का अखाड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए गंभीर नीतिगत विमर्श का सर्वोच्च मंच है।
12 अक्टूबर 1935 को महाराष्ट्र के लातूर जिले के चाकुर में जन्मे शिवराज पाटिल ने राज्य विधानसभा से लेकर संसद के दोनों सदनों तक अपनी अमिट छाप छोड़ी। वे केंद्रीय गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वाणिज्य राज्य मंत्री जैसे शीर्ष मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालने के अलावा पंजाब के राज्यपाल और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के प्रशासक भी रहे। उनका शांत व्यक्तित्व, कानून की गहरी समझ और बौद्धिक दृष्टिकोण दलगत सीमाओं से परे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच आदर का पात्र रहा। संसद के संविधान सदन में आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा ने देश की नई पीढ़ी के जनप्रतिनिधियों को संसदीय शिष्टाचार, सहिष्णुता और संवैधानिक निष्ठा के शाश्वत मूल्यों की पुनः याद दिलाई।