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उत्तर प्रदेश विधानसभा उपचुनाव के सहारे खोई हुई जमीन वापस पाने को बेताब भाजपा

बी एस राय/ लखनऊ : लोकसभा या विधानसभा क्षेत्रों के लिए उपचुनाव आम तौर एक सामान्य प्रक्रिया होती है लेकिन ऐसा तभी तक होता है जब तक कि राज्य सरकार के अस्तित्व के लिए इसका कोई महत्व न हो। उपचुनाव में किसी हाई-प्रोफाइल राजनेता की उम्मीदवारी भी कभी-कभी उपचुनाव को काफी रोचक बना देते हैं। जानका बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 1978 की चिकमंगलूर से उपचुनाव लड़ी थीं जिस वजह से यह चुनाव काफी चर्चित रहा था। इसके बाद 1974 में जबलपुर से दिग्गजन नेता शरद यादव ने उपचुनाव लड़कर शानदार जीत हासिल की थी। उनकी जीत ने भी काफी सुर्खियां बटोरी थीं। ठीक इसी तरह यूपी में 9 सीटों पर होने वाले उपचुनाव के नतीजों की धमक भी काफी दूर तक और लंबे समय तक सुनायी देगी।

उत्तर प्रदेश में नौ विधानसभा क्षेत्रों के लिए उपचुनाव होने हैं। पहले ये चुनाव 13 नवंबर को होने थे, लेकिन त्योहारों के कारण 20 नवंबर तक टाल दिए गए। हालांकि, यह मुकाबला कई कारणों से महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से दिलचस्प होता जा रहा है, जिसमें भाजपा और विपक्ष दोनों के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा है। इन्हें चुनावी रूप से महत्वपूर्ण यूपी में जनता के मूड के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसने लोकसभा चुनावों में आश्चर्यजनक जनादेश दिया था। ये सीटें पूरे राज्य में फैली हुई हैं – पूर्वी उत्तर प्रदेश में तीन, पश्चिम में चार और मध्य तथा ब्रज क्षेत्र में एक-एक सीटें शामिल हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे के बावजूद सत्तारूढ़ पार्टी को चार महीने पहले लोकसभा चुनावों में उस समय करारा झटका लगा था जब उसकी सीटें 62 से गिरकर 33 पर आ गईं। इस परिणाम के बाद संगठन में भारी उथल-पुथल देखने को मिली थी। समाजवादी पार्टी (सपा) ने 80 में से 37 सीटें जीतकर खुद को, अपने प्रतिद्वंद्वियों और बड़े विपक्ष को चौंका दिया जबकि कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं।

भाजपा खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए बेताब है ताकि यह संकेत दिया जा सके कि हिंदी पट्टी में लोकसभा में मिली हार शायद एक अपवाद थी। हरियाणा और राजस्थान विधानसभा चुनावों में भाजपा की वापसी ने शायद उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ पर और दबाव बढ़ा दिया है। लोकसभा के नतीजों ने उत्तर प्रदेश भाजपा में असामान्य और बल्कि उत्सुकता पैदा कर दिया था। उपचुनाव का परिणाम भाजपा के लिए बुरा होता है तो पार्टी में दरार बढ़नी तय है। संगठन के भीतर कुछ लोग ऐसे भी है जो बुरे नतीजे के इंतजार में बैठे हैं।

दूसरी ओर, सपा को यह साबित करना होगा कि लोकसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन कोई क्षणिक नहीं था और 2027 में विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में धीरे-धीरे राजनीतिक बदलाव हो रहा है। इसने सहयोगी कांग्रेस को दरकिनार कर दिया है और सभी नौ उपचुनाव लड़ने का जिम्मा खुद उठाया है। लेकिन अब तक के अभियान में रणनीति बदलने के कोई संकेत नहीं मिले हैं।

आदित्यनाथ ने विवादास्पद नारा ‘बटेंगे तो कटेंगे’ गढ़ा है, जिसे आरएसएस और मोदी का समर्थन प्राप्त है। नारे की प्रकृति के अलावा, कई लोग इसे जाति जनगणना की पहेली से जोड़ते हैं जिसका सामना भाजपा कर रही है। विपक्ष द्वारा जाति जनगणना कराने के लिए केंद्र सरकार पर तीव्र दबाव डालने के साथ ही पार्टी के हिंदू वोट बैंक और बड़े समुदाय को संदेश सरल और स्पष्ट प्रतीत होता है। दरअसल, यूपी में हिंदू वोटों में विभाजन ने भाजपा और आरएसएस दोनों को चिंतित कर दिया था, इसलिए सभी जातियों को एकजुट करने के लिए अपने हिंदुत्व के एजेंडे को तेज करने का प्रयास किया। आदित्यनाथ पहले ही सभी नौ निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा कर चुके हैं और एक और अभियान दौरे की योजना बना रहे हैं।

सपा ने जवाब में ‘जुड़ेंगे तो जीतेंगे’ का नारा दिया है और अपनी रणनीति पीडीए – पिछड़े (पिछड़े), दलित और अल्पसंख्यक – रणनीति पर कायम है। इसके अनुरूप, पार्टी ने चार मुसलमानों, तीन पिछड़े वर्गों और दो दलितों को टिकट दिया है। वहीं दूसरी ओर देखें तो भाजपा और सपा के अलावा ये चुनाव बसपा की मुखिया मायावती के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, जो पिछले चुनावों से हटकर उपचुनाव लड़ रही हैं। मायावती ने अपना खुद का नारा गढ़ा है: “बसपा से जुड़ेंगे तो आगे बढ़ेंगे, सुरक्षित रहेंगे”। सपा के सख्त रवैये से नाखुश कांग्रेस ने उसके उम्मीदवारों का समर्थन करने और विपक्षी एकता के लिए काम करने का वादा किया है। लेकिन अगर सपा बड़ी जीत हासिल करने में विफल रहती है तो कांग्रेस को भविष्य में दबाव बनाने का मौका भी मिलेगा।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक कुमार पंकज कहते हैं कि यूपी का उपचुनाव निश्चित तौर से दोनों ही पार्टियों के लिए साख की लड़ाई है। बीजेपी इस बार चूकी तो संगठन के भीतर घमासान मचना तय है। लेकिन यदि बीजेपी जीती तो योगी की साख निश्चित तौर पर बढ़ेगी। वहीं दूसरी ओर बीजेपी इस चुनाव में अपनी उस रणनीति का लिटमस टेस्ट भी करना चाहेगी जिसके लिए योगी ने बटेंगे तो कटेंगे का नारा दिया था। वहीं सपा के मुखिया अखिलेश के लिए भी यह चुनाव जीतना इतना आसान नहीं होगा। हालांकि उपचुनाव में पहली बार बसपा की मौजूदगी से भी कई सीटों पर लड़ाई रोचक होने की उम्मीद है।