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आकाश आनंद की वापसी मायावती की राजनीतिक मजबूरी या समझदारी?

बीएस राय/ Bahujan Samaj Party: बीएसपी सुप्रीमो मायावती और उनके भतीजे आकाश आनंद के बीच लंबे समय से चल रही राजनीतिक खींचतान आखिरकार खत्म हो गई है। अंबेडकर जयंती से ठीक एक दिन पहले आकाश आनंद ने सार्वजनिक तौर पर मायावती से माफी मांगी और पार्टी में फिर से शामिल होने की इच्छा जताई और कुछ ही घंटों में मायावती ने बड़ा दिल दिखाते हुए उन्हें माफ कर दिया। इस तरह 3 मार्च को बीएसपी से निकाले जाने के 41 दिन बाद आकाश की ‘घर वापसी’ हो गई।

आकाश आनंद को पार्टी से निकालने की वजह उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ की राजनीतिक सलाह पर अमल करना था। लेकिन जिस तरह से इस विवाद को सुलझाया गया, उससे पता चलता है कि मामला सिर्फ पारिवारिक कलह नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक रणनीति थी। सूत्रों की मानें तो यह ‘माफी’ और ‘वापसी’ पर्दे के पीछे पहले से ही तय थी और बस इसे लागू करने के लिए सही मौके का इंतजार था – जो अंबेडकर जयंती से एक दिन पहले मिल गया।

मायावती को यह बात अच्छी तरह पता है कि बसपा का भविष्य सुरक्षित हाथों में सौंपना जरूरी है और वह हाथ सिर्फ आकाश आनंद के ही हो सकते हैं। आकाश न सिर्फ मायावती के भतीजे हैं बल्कि दलित युवाओं के बीच भी उनकी मजबूत पकड़ है। ऐसे समय में जब चंद्रशेखर आजाद, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टियां दलित वोट बैंक को लुभाने में जुटी हैं, आकाश आनंद की वापसी मायावती के लिए अहम रणनीतिक कदम साबित हो सकती है।

आकाश आनंद की माफी और मायावती की स्वीकारोक्ति सिर्फ पारिवारिक मेलमिलाप का मामला नहीं है बल्कि इससे एक साफ राजनीतिक संदेश भी जाता है- बसपा में नेतृत्व में युवाओं को जगह मिल सकती है लेकिन पार्टी अनुशासन सर्वोपरि है। आकाश ने अपने चार ट्वीट में माना कि वह मायावती को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं और भविष्य में पार्टी के हित में ही काम करेंगे।

दलित राजनीति का बदलता परिदृश्य आज दलित राजनीति एक नए मोड़ पर है। चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता दलित युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। सपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां भी दलित एजेंडे पर अपनी दावेदारी मजबूत कर रही हैं। ऐसे में मायावती के लिए अपने कोर वोट बैंक को एकजुट रखना बड़ी चुनौती बन गई है।

आकाश आनंद की वापसी उसी चुनौती का जवाब है- युवाओं को फिर से बीएसपी से जोड़े रखने की कोशिश। भविष्य की राजनीतिक बिसात आकाश आनंद अब बीएसपी में किसी पद पर नहीं हैं, लेकिन उनके लिए यह एक नया राजनीतिक अध्याय है। उनकी अगली भूमिका क्या होगी, यह आने वाले महीनों में, खासकर 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद स्पष्ट होगा। लेकिन यह तय है कि वह अब एक बार फिर बीएसपी की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।