सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को SIR जारी रखने का दिया निर्देश, जानिए इसकी वजहें

बीएस राय: सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के चुनाव आयोग को बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को जारी रखने की अनुमति देते हुए इसे “संवैधानिक आदेश” बताया।बीएस राय
हालांकि, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस प्रक्रिया के समय पर सवाल उठाया और प्रथम दृष्टया यह राय दी कि बिहार में एसआईआर के दौरान आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड पर विचार किया जा सकता है।
पीठ ने कहा, “हमारा प्रथम दृष्टया यह मत है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण में आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को शामिल किया जाना चाहिए।”
यह देखते हुए कि 10 विपक्षी दलों के नेताओं सहित किसी भी याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने की मांग नहीं की, पीठ ने याचिकाओं पर जवाब मांगा और सुनवाई 28 जुलाई के लिए स्थगित कर दी।
पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग को 21 जुलाई तक याचिकाओं पर जवाबी हलफनामा दाखिल करना चाहिए और 28 जुलाई तक जवाब दाखिल करने चाहिए।
पीठ ने कहा कि उसे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं है, क्योंकि यह एक संवैधानिक दायित्व है, लेकिन इस प्रक्रिया का समय संदेह पैदा कर रहा है।
पीठ ने चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी से कहा, “हमें आपकी ईमानदारी पर संदेह नहीं है, लेकिन कुछ धारणाएँ हैं। हम आपको रोकने के बारे में नहीं सोच रहे हैं क्योंकि यह एक संवैधानिक दायित्व है।”
द्विवेदी ने कहा कि 60 प्रतिशत मतदाताओं ने अपनी पहचान सत्यापित कर ली है और उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि बिना सुनवाई के किसी भी मतदाता का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा।
पीठ ने कहा, “हम किसी संवैधानिक संस्था को वह करने से नहीं रोक सकते जो उसे करना चाहिए। साथ ही, हम उन्हें वह भी नहीं करने देंगे जो उन्हें नहीं करना चाहिए।”
इससे पहले, पीठ ने चुनाव आयोग से चुनावी राज्य बिहार में एसआईआर अभियान के समय पर सवाल उठाया और कहा कि यह “लोकतंत्र और मतदान के अधिकार की जड़” पर हमला है। साथ ही, पीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि चुनाव आयोग के पास इसे लागू करने का कोई अधिकार नहीं है।
चुनाव आयोग ने भी इस प्रक्रिया को उचित ठहराया और कहा कि आधार “नागरिकता का प्रमाण” नहीं है।
पीठ ने द्विवेदी से बिहार में एसआईआर अभियान में आधार कार्ड को शामिल न करने पर सवाल किया और कहा कि चुनाव आयोग का किसी व्यक्ति की नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं है और यह गृह मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र है।
द्विवेदी ने संविधान के अनुच्छेद 326 का हवाला देते हुए जवाब दिया कि प्रत्येक मतदाता भारतीय नागरिक होना चाहिए और “आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है”।
न्यायमूर्ति धूलिया ने कहा, “अगर आपको बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर के तहत नागरिकता की जाँच करनी है, तो आपको पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए थी; अब थोड़ी देर हो चुकी है।”
इस बीच, पीठ ने याचिकाकर्ताओं के वकील की इस दलील को खारिज कर दिया कि चुनाव आयोग को बिहार में ऐसी कोई भी प्रक्रिया करने का अधिकार नहीं है क्योंकि यह संविधान के तहत अनिवार्य है और पिछली बार ऐसी प्रक्रिया 2003 में हुई थी।
याचिकाकर्ताओं की दलीलों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग को तीन सवालों के जवाब देने होंगे क्योंकि बिहार में एसआईआर प्रक्रिया “लोकतंत्र की जड़ और वोट देने की शक्ति” से जुड़ी है।
याचिकाकर्ताओं, जिनमें राजनीतिक दल और उनके नेता, नागरिक समाज के सदस्य और संगठन शामिल हैं, के सवाल चुनाव आयोग की ऐसी प्रक्रिया करने की शक्ति और उसके समय से संबंधित हैं।
द्विवेदी ने कहा कि समय के साथ, मतदाता सूची में मतदाताओं के नाम शामिल करने या बाहर करने के लिए संशोधन की आवश्यकता होती है और एसआईआर ही ऐसा करने का एकमात्र तरीका है।
उन्होंने पूछा कि अगर चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में संशोधन करने का अधिकार नहीं है तो फिर किसके पास है?
हालांकि, चुनाव आयोग ने शीर्ष अदालत को आश्वासन दिया कि वह सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी को भी मतदाता सूची से बाहर नहीं करेगा।