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जीवन मिशन में रिसते भरोसे

राघवेंद्र प्रताप सिंह: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ का उद्देश्य देश के हर ग्रामीण घर तक स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना है। यह योजना विकास और स्वास्थ्य दोनों के लिहाज से क्रांतिकारी मानी जा रही थी। लेकिन उत्तर प्रदेश के कई जिलों से सामने आ रही भ्रष्टाचार की खबरें और हाल ही में सीतापुर जिले में जल जीवन मिशन के तहत बनी पानी की टंकी के भरभराकर गिरने की घटना ने इस योजना की पारदर्शिता और क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सीतापुर की घटना: हादसा या लापरवाही का प्रत्यक्ष प्रमाण?

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में जल जीवन मिशन के तहत बनी एक ऊंची पानी की टंकी अचानक भरभराकर गिर गई। यह टंकी खैराबाद ब्लॉक एक गांव में स्थापित की गई थी। गनीमत रही कि घटना के वक्त आसपास कोई मौजूद नहीं था, अन्यथा यह एक बड़ा जनहानि का कारण बन सकता था।

ग्रामीणों के अनुसार, यह टंकी पिछले कुछ महीनों से जर्जर अवस्था में थी और कई बार इसकी दरारें प्रशासन को दिखाईं भी गई थीं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। टंकी निर्माण के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन गुणवत्ताहीन सामग्री के चलते यह निर्माण हादसे में बदल गया।

जल जीवन मिशन: उद्देश्य और बजट

जल जीवन मिशन की शुरुआत अगस्त 2019 में हुई थी। इसका लक्ष्य 2024 तक देश के हर ग्रामीण घर में नल के माध्यम से स्वच्छ जल पहुंचाना था। इस मिशन के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की हिस्सेदारी से अरबों रुपये का बजट निर्धारित किया गया। उत्तर प्रदेश को भी इस योजना के तहत बड़े पैमाने पर फंड आवंटित हुए।
वर्ष 2023-24 में अकेले यूपी को 12,000 करोड़ से अधिक की राशि जल जीवन मिशन के तहत प्राप्त हुई थी। योजना के तहत लाखों घरों में नल कनेक्शन दिए गए, सैकड़ों पानी की टंकियां बनीं और पाइपलाइन नेटवर्क बिछाया गया।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

भ्रष्टाचार के आरोप: केवल सीतापुर ही नहीं

सीतापुर की घटना इस मिशन की एक बानगी भर है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों – जैसे बहराइच, गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती, लखीमपुर खीरी, फतेहपुर और सोनभद्र से भी जल जीवन मिशन में भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आ चुकी हैं।
कुछ प्रमुख आरोप इस प्रकार हैं:

  1. मानकहीन निर्माण सामग्री का इस्तेमाल: टंकी निर्माण, पाइपलाइन बिछाने और पंप हाउस बनाने में घटिया सामग्री का धड़ल्ले से प्रयोग हुआ।
  2. फर्जी नल कनेक्शन: कई गांवों में नल कनेक्शन कागजों पर दिखाए गए, लेकिन जमीनी तौर पर कोई कार्य नहीं हुआ।
  3. बिना जल स्रोत के योजनाएं: अनेक गांवों में बोरवेल नहीं हुआ, लेकिन योजना की रिपोर्ट में वहां जलापूर्ति चालू दिखाई गई।
  4. बिना पानी के नल: कई जगह नल लगाए गए, लेकिन उनमें कभी पानी आया ही नहीं।
  5. आधिकारियों की मिलीभगत: ग्राम प्रधान, ठेकेदार और जल निगम के अफसरों की सांठगांठ से फर्जी बिलों के माध्यम से भुगतान कर लिया गया।

जनता की पीड़ा: ‘नल आया, पानी नहीं’

कई गांवों में जहां नल लगाए गए, वहां महीने में सिर्फ दो-तीन बार पानी आता है, वो भी गंदा या बदबूदार। ग्रामीण महिलाओं की पीड़ा है कि वे पहले कुएं या हैंडपंप से पानी भरती थीं, अब नलों ने झूठा भरोसा दिया है। कहीं नल से मिट्टी आती है, तो कहीं हवा।
सीतापुर की एक महिला सरोज देवी कहती हैं

“हमसे कहा गया था कि अब रोज घर में पानी मिलेगा, लेकिन पिछले छह महीने में एक बार भी नल से साफ पानी नहीं आया। उल्टा टंकी गिर गई, तो डर और बढ़ गया।”

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

सीतापुर की घटना के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरा। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष ने इसे ‘सरकारी भ्रष्टाचार का प्रतीक’ बताया और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की। कांग्रेस ने जांच की मांग करते हुए कहा कि “जल जीवन मिशन, जल संकट नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का स्रोत बन गया है।”
दूसरी ओर, भाजपा सरकार ने प्रारंभिक जांच के आदेश दे दिए हैं और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों को निलंबित करने का आश्वासन दिया है।

जांच के नाम पर खानापूर्ति?

2019 से अब तक जल जीवन मिशन के अंतर्गत यूपी में 1.5 करोड़ से अधिक घरों में नल कनेक्शन दिए जाने का दावा किया गया है। लेकिन जब फील्ड स्तर पर जांच होती है तो स्थिति भयावह नजर आती है।
विधानसभा में कई बार इस योजना में फर्जीवाड़े को लेकर प्रश्न उठ चुके हैं। कैग (CAG) की रिपोर्ट में भी जल जीवन मिशन के कार्यान्वयन में पारदर्शिता की कमी, निरीक्षण की अनुपस्थिति और अनियमित व्यय का उल्लेख है।

सूचना के अधिकार के तहत खुलासा

आरटीआई कार्यकर्ता अजय सिंह ने सीतापुर जिले के खैराबाद और महमूदाबाद ब्लॉकों में जल जीवन मिशन के तहत खर्च की गई राशि की जानकारी मांगी। जवाब में जो आंकड़े सामने आए, वे चौंकाने वाले थे।
एक गांव में जहां 10 लाख रुपये में बोरिंग और टंकी निर्माण होना था, वहां केवल गड्ढा खोद कर छोड़ दिया गया।
एक गांव में 75 घरों को नल कनेक्शन दिखाया गया, जबकि मौके पर केवल 9 नल लगे मिले।

समस्याओं की जड़: तंत्र की ढील और निगरानी की कमी

जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं जमीनी स्तर पर ग्राम पंचायत और जल निगम के अधिकारियों की देखरेख में संचालित होती हैं। लेकिन कहीं तकनीकी पर्यवेक्षण नहीं होता, कहीं मॉनिटरिंग रिपोर्ट ही फर्जी बन जाती है।
नकली निर्माण सामग्री के सैंपल की टेस्टिंग ही नहीं होती। ठेकेदारों की नियुक्ति में पारदर्शिता नहीं बरती जाती। अभियंता और जेई से लेकर सचिव स्तर तक की चेन में कमीशनखोरी का जाल फैला हुआ है।

समाधान की राह: क्या किया जा सकता है?

  1. स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट: जल जीवन मिशन के सभी कार्यों का स्वतंत्र एजेंसियों से तकनीकी ऑडिट कराया जाए।
  2. सार्वजनिक भागीदारी: ग्राम स्तर पर जल समिति बनाई जाए जिसमें स्थानीय नागरिक, महिलाएं और शिक्षित युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो।
  3. रियल-टाइम निगरानी: कार्यों की निगरानी के लिए मोबाइल ऐप और ड्रोन तकनीक का उपयोग किया जाए।
  4. कड़ी कार्रवाई: सीतापुर जैसी घटनाओं में दोषियों को केवल निलंबित न किया जाए, बल्कि गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
  5. मीडिया और आरटीआई को भूमिका: मीडिया और सामाजिक संगठनों को इस योजना की निगरानी में सहभागी बनाया जाए।

जल जीवन मिशन ग्रामीण भारत के लिए एक वरदान साबित हो सकता है, यदि इसका क्रियान्वयन पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ हो। लेकिन यदि टंकियां गिरती रहें, पानी नहीं आए और जनता ठगी महसूस करे, तो यह मिशन सिर्फ एक और सरकारी तमाशा बनकर रह जाएगा।

सीतापुर की गिरी हुई टंकी महज एक ढांचा नहीं थी, वह जनता के विश्वास की भी प्रतीक थी। उसका गिरना केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि तंत्र की निष्ठा पर चोट है। अब समय आ गया है कि सरकार और प्रशासन इस पर गंभीरता से विचार करें, वरना पानी के नाम पर गहराता यह भ्रष्टाचार लोकतंत्र की जड़ें खोखली कर देगा।