हर चोट पर भारी पड़ा हौसला, पंत की बल्लेबाज़ी बनी जज़्बे की मिसाल
भारत और इंग्लैंड के बीच चौथे टेस्ट के दूसरे दिन 314 के स्कोर पर शार्दुल ठाकुर के रूप में भारत का छठा विकेट गिरता है। पवैलियन की सीढ़ियों से एक शख्स आहिस्ते-आहिस्ते उतरता दिखाई देता है। भीड़ का जोश बढ़ जाता है।

उस शख्स की हिम्मत को सलाम है। भीड़ का शोर उसका इस्तकबाल कर रही है। वह शख्स है- ऋषभ पंत। फाइटर पंत। भीषण सड़क हादसे के बाद जब कट्टर से कट्टर समर्थक तक जब कल्पना नहीं कर रहा था कि उनका हीरो फिर क्रिकेट मैदान पर कभी लौट पाएगा भी या नहीं, तब अपनी जिद से असंभव जैसे को संभव कर दिखाया।
इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर में खेलते हुए हड्डी टूट गई, लेकिन हौसला नहीं। अगले मैच से बाहर हो गए लेकिन मैनचेस्टर में दूसरे दिन बल्लेबाजी के लिए उतरे। रन भी दौड़े। वैसे ही जैसे कभी लहूलुहान होने के बावजूद युवा सचिन तेंदुलकर पाकिस्तान के खूंखार गेंदबाजों के सामने अड़ गए।
वैसे ही जैसे कभी अनिल कुंबले ने वेस्टइंडीज के खिलाफ टूटे जबड़े के साथ गेंदबाजी की थी और ब्रायन लारा को चलता किया। ऋषभ पंत 37 रन बनाकर खेल रहे थे, तभी इंग्लैंड के पेसर क्रिस वोक्स की एक गेंद से बुरी तरह घायल हो गए। रिवर्स स्वीप खेलने की कोशिश की और गेंद बल्ले का किनारा चूमकर सीधे उनके दाहिने पैर पर लगी। पंत दर्द से कराह उठे। छटपटाने लगे। उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा।
बाद में पता चला कि उनकी उंगलियों की हड्डी टूट गई है। अब क्रिकेट से कम से कम 6 हफ्ते दूर रहना पड़ेगा। इसके बाद भी पंत मैनचेस्टर टेस्ट के दूसरे दिन बल्लेबाजी के लिए उतरे। दौड़कर रन भी लेते दिखे और छक्का जड़ते हुए भी। ऋषभ पंत तो हैं ही एक फाइटर। लेकिन भारतीय टीम की तो परंपरा रही है- साहस, जज्बा, कभी न हार मानने की जिद।
पंत ने गुरुवार को सचिन तेंदुलकर, अनिल कुंबले जैसे महान क्रिकेट योद्धाओं की परंपरा को आगे बढ़ाया है। मई 2002 की वो घटना। भारत का वेस्टइंडीज दौरा। चौथे टेस्ट में वेस्टइंडीज के गेंदबाज मर्व डिलन की एक गेंद बल्लेबाजी कर रहे अनिल कुंबले के चेहरे से जा टकराई। कुंबले लहूलुहान हो गए। जबड़ा टूट गया।
उसके बाद भी पट्टी बांधकर गेंदबाजी के लिए उतरे। 14 ओवर फेंके और महान ब्रायन लारा को आउट भी किया। 1989 में कराची में भारत और पाकिस्तान के बीच का पहला टेस्ट। 16 साल के सचिन तेंदुलकर बल्लेबाजी कर रहे हैं। तभी वकार यूनुस की एक खतरनाक बाउंसर उनकी नाक पर जी लगी। पूरा चेहरा लहूलुहान हो गया।
लेकिन उस 16 साल के लड़के ने दिखा दिया कि वह कुछ अलग ही मिट्टी का बना है। मैदान छोड़ने से इनकार दिया। बैटिंग जारी रखी। 1999 में भी मास्टर ब्लास्टर पाकिस्तान के खिलाफ चेन्नई टेस्ट में कंधे की असहनीय चोट के बावजूद बल्लेबाजी जारी रखी। ऋषभ पंत भी उसी परंपरा के योद्धा है।