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हार नहीं, भारतीय खेलों का निर्णायक मोड़ थी मेरी दौड़ : पी. टी. उषा

लॉस एंजिलिस ओलंपिक में मामूली अंतर से कांस्य पदक से चूकने वाली उड़नपरी पी टी उषा ने शुक्रवार को इसे अपनी हार नहीं बल्कि भारतीय खेलों के लिए एक निर्णायक पल माना।

साभार : गूगल

उन्होंने बोला कि इस घटना ने साबित कर दिया कि भारत की एक महिला दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों को चुनौती दे सकती है। उषा ने लॉस एंजिलिस ओलंपिक में महिलाओं की 400 मीटर बाधा दौड़ में सेकंड के सौवें हिस्से से कांस्य पदक गंवा दिया था।

भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष ने एक समिट के दौरान अपने करियर को याद करते हुए कहा, “केरल के एक छोटे से गांव पायोली में पली-बढ़ी एक लड़की थी जिसे खेलना बहुत पसंद था।

उस समय हमारे पास न तो अच्छे स्टेडियम थे, न ही वैज्ञानिक प्रशिक्षण, और न ही अच्छे जूते। मैं खुरदुरे मैदानों पर नंगे पैर दौड़ती थी क्योंकि मुझे खेल में खुशी मिलती थी।” उन्होंने आगे कहा, “मेरा वह सपना मुझे विश्व मंच तक ले गया। 1984 लॉस एंजिलिस ओलंपिक मेरे करियर का सबसे यादगार पल था।

मैंने भारत का परचम लहराने के लिए वर्षों मेहनत की थी। 400 मीटर बाधा दौड़ में पदक से सेकंड के सौवें हिस्से से चूकना कई लोगों को मेरी हार लग सकता है, लेकिन मेरे लिए यह भारतीय खेलों का एक निर्णायक क्षण था।”

‘पायोली एक्सप्रेस’ के नाम से प्रसिद्ध उषा ने कहा, “इसने साबित कर दिया कि भारत की एक महिला विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती दे सकती है। इससे देश के हर युवा खिलाड़ी को संदेश मिला कि अगर बड़े सपने देखें और मेहनत करें, तो कुछ भी असंभव नहीं है। यही खेलों की असली ताकत है।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय खेलों में कई ऐसे प्रेरणादायक पल आए हैं जैसे हॉकी में ध्यानचंद का जादू, मिल्खा सिंह की दौड़, क्रिकेट के जरिए देश को एकजुट करना, और बैडमिंटन, मुक्केबाजी, कुश्ती व निशानेबाजी में सफलताएं। लेकिन सिर्फ इतिहास पर निर्भर रहकर आगे बढ़ना संभव नहीं है।

भविष्य के लिए जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं का विकास आवश्यक है। दूर-दराज के गांवों में नंगे पैर दौड़ते बच्चे या घर के आंगन में कबड्डी खेलते बच्चों को खोजकर उनकी प्रतिभा को निखारना होगा। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य केवल क्रिकेट या कुछ चुनिंदा खेलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हर खेल में सफलता हासिल करनी होगी।

उन्होंने जोर देते हुए कहा, “हमारा मिशन भारत को न केवल क्रिकेट या कुछ खेलों में, बल्कि एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक, साइक्लिंग जैसे कई खेलों में आगे बढ़ाना है। डेटा विश्लेषण, बायोमैकेनिक्स, रिकवरी प्रक्रिया और पोषण जैसी तकनीकों से ही चैम्पियन बनते हैं, और हमें इन्हें हर खिलाड़ी तक पहुंचाना होगा।”

उषा ने कहा कि भारत को एक महान खेल राष्ट्र बनाने के लिए निरंतर और व्यापक सफलता जरूरी है, जिसका आधार एक मजबूत तंत्र होगा जो हर खेल की प्रतिभाओं को तराशे। उन्होंने यह भी कहा कि इस मिशन के लिए सोच में बदलाव भी जरूरी है और खेलों को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा।

“हर स्कूल में बच्चों को खेलने के लिए जगह और समय दिया जाना चाहिए। माता-पिता खेल को एक कैरियर विकल्प के रूप में देखें। जब ऐसा होगा तो पदक अपने आप मिलेंगे।

मेरे उतार-चढ़ाव भरे सफर ने मुझे सिर्फ पदक ही नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मविश्वास और बड़े सपने देखने का हौसला भी दिया। मैं चाहती हूं कि हर युवा भारतीय खिलाड़ी इस अनुभव को महसूस करे।”