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सपनों का टूटना और संघर्ष का सफर, परवीन हुड्डा की पुनः वापसी की कहानी

पेरिस ओलंपिक के लिए कोटा हासिल करने के बाद जब यह खबर आई कि परवीन हुड्डा इस बार ओलंपिक में नहीं खेल सकेंगी, तो वह पूरी तरह से चौंक गईं। हरियाणा की इस प्रतिभाशाली मुक्केबाज को अचानक अपने सपनों का टूटना महसूस हुआ, और उन्हें समझ ही नहीं आया कि उनके साथ क्या हो रहा है।

पिछले कुछ सालों से ओलंपिक की तैयारी में जुटी हुई परवीन को निलंबन का नोटिस मिलना किसी बुरे सपने जैसा था। यह उनके लिए एक बड़ा झटका था, जो पहले ही 2022 एशियाई चैम्पियनशिप और विश्व चैम्पियनशिप में शानदार प्रदर्शन कर चुकी थीं।

डोपिंग से जुड़ी एक विवाद की वजह से परवीन को विश्व डोपिंग निरोधक एजेंसी ने 22 महीने का प्रतिबंध लगाया था, जो बाद में घटकर 14 महीने हो गया। इस निलंबन का खामियाजा न सिर्फ उनके व्यक्तिगत करियर को हुआ, बल्कि भारत को भी 57 किलो वर्ग के ओलंपिक कोटे से हाथ धोना पड़ा।

साभार : गूगल

साथ ही, एशियाई खेलों का कांस्य पदक भी उनके नाम से गायब हो गया। परवीन ने इस पूरे अनुभव को एक समाचार एजेंसी संग साझा करते हुए बताया कि, “जब मुझे बताया गया कि मैं ओलंपिक नहीं जा पा रही हूं, तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया। यह सब बहुत अचानक हुआ था, और मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी मेहनत और सपने मिट गए हों।”

यह क्षण उनके लिए बेहद मुश्किल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। एक महीने का मानसिक ब्रेक लेकर उन्होंने खुद को संभालने की कोशिश की और स्वीकार किया कि जो हुआ, वह अब उनके नियंत्रण में नहीं था। उन्होंने आगे बताया, “मेरे शिविर में मनोवैज्ञानिक प्रियावृंदा मैम ने निशुल्क सत्र आयोजित किए और मानसिक रूप से मुझे सहारा दिया।

आईटीबीपी ने भी इस दौरान मेरी मदद की और मुझे प्रशिक्षण देने के लिए कोच जोगिंदर सौन को बुलाया।” फिर भी, उनके सामने एक नई चुनौती थी – कंधे की चोट। इस चोट के कारण उनकी वापसी में देर हुई, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। “चोट के चलते चार से पांच महीने की रिकवरी के बाद लौटना मुश्किल था, लेकिन मैंने अपनी हिम्मत को बनाए रखा।”

सितंबर में अखिल भारतीय पुलिस चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के बाद, अक्टूबर में बीएफआई कप में खिताब जीतने के साथ ही परवीन ने अपने लौटने का संकेत दिया। अब जब वह राष्ट्रीय शिविर में वापस आईं, तो उन्होंने अपने अगले लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया।

विश्व मुक्केबाजी फाइनल्स कप में अपनी भागीदारी को लेकर परवीन कहती हैं, “मैं नर्वस हूं, लेकिन साथ ही रोमांचित भी हूं। मुझे खुशी है कि टीम में वापस लौट सकी और यह अवसर मिला। यह मेरे लिए खुद को फिर से परखने का मौका है।”

इस पूरी यात्रा ने परवीन को मानसिक और शारीरिक रूप से एक नया दृष्टिकोण दिया है, और अब वह खुद को साबित करने के लिए तैयार हैं। इस कठिन समय से उबरकर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि कठिनाइयां सिर्फ सफलता के रास्ते में रुकावटें डालती हैं, लेकिन किसी सच्चे खिलाड़ी की इच्छाशक्ति को नहीं तोड़ सकतीं।