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अनुशासन और धैर्य की मिसाल: दक्षिणेश्वर सुरेश का टेनिस सफर

इस युग में जहाँ दिखावे और त्वरित सफलता की चाह आम हो गई है, कुछ खिलाड़ी ऐसे भी हैं जो चुपचाप, कड़े अनुशासन और वर्षों की अथक मेहनत से अपने करियर को ऊँचाइयों तक ले जाते हैं। भारतीय डेविस कप टीम के नए सितारे दक्षिणेश्वर सुरेश इसी श्रेणी के खिलाड़ी हैं।

दक्षिणेश्वर का टेनिस सफर चमक-दमक से दूर, एक व्यवस्थित और सतत प्रयास की कहानी है। उन्होंने भारतीय टेनिस में हाशिए से मुख्य भूमिका तक पहुँचने का मार्ग कठिन पर धैर्यपूर्ण तरीके से तय किया।

उनका टेनिस से जुड़ाव पारिवारिक था। पिता सुरेश, डिंडीगुल के क्लब स्तर के खिलाड़ी रहे, और उनके शुरुआती संपर्कों ने दक्षिणेश्वर को चेन्नई में लक्ष्मण चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त करने में मदद की। छोटे कदमों से ही उनकी कड़ी मेहनत शुरू हो गई। 2010 से 2016 तक वह प्रतिदिन चेन्नई में लगभग 16 किलोमीटर बस यात्रा करते थे।

चक्रवर्ती बताते हैं, “तब वह सिर्फ नौ साल का था। उसमें अहंकार का कोई भाव नहीं था। उसे सुरपेट से मोगाप्पैर, फिर मोगाप्पैर से अन्ना नगर और अन्ना नगर से लोयोला कॉलेज, नुंगमबक्का जाना पड़ता था। सुबह का समय अन्ना नगर में फिटनेस ट्रेनर रंजीत के साथ बीतता, उसके बाद लोयोला कॉलेज में टेनिस सत्र।”

साभार : गूगल

चक्रवर्ती के अनुसार, दक्षिणेश्वर का रवैया हमेशा अनुशासित और शांत रहा। उन्होंने कभी भी कड़ी मेहनत से पीछे नहीं हटे। यहां तक कि कई वर्षों तक पेप्सी या कोक तक नहीं पी।

पैसों की कमी और सीमित अवसरों के बावजूद उन्होंने पीछे नहीं हटा। 2016 में फ्रांस में प्रशिक्षण और उसी वर्ष डीएलटीए अंडर-16 फेनेस्टा ओपन राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीतकर उन्होंने करियर का पहला बड़ा मील का पत्थर छुआ।

हालांकि 2019 में पीठ की चोट और उसके बाद कोविड-19 महामारी ने प्रतिस्पर्धा और प्रायोजन को रोक दिया, लेकिन दक्षिणेश्वर ने अवसर की कमी में भी हार नहीं मानी। पूर्व भारतीय खिलाड़ी सोमदेव देववर्मन की सलाह पर उन्होंने अमेरिका में छात्रवृत्ति के साथ प्रशिक्षण जारी रखा।

चक्रवर्ती बताते हैं, “कॉलेज टेनिस में लगातार मैच खेलना, टीम प्रतियोगिता का दबाव और पेशेवर माहौल ने उसे मानसिक रूप से मजबूत बनाया। अब यही मानसिक दृढ़ता उसे डेविस कप में निडर और संयमित प्रदर्शन में दिखाई दे रही है।”

असल में, बेंगलुरु में नीदरलैंड के खिलाफ हालिया डेविस कप मुकाबले में दक्षिणेश्वर ने टीम की जरूरत के समय तीनों मैच जीतकर भारत की 3-2 की जीत सुनिश्चित की। वर्तमान में वह मई में वेक फॉरेस्ट विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे।

चक्रवर्ती दक्षिणेश्वर को अपना सबसे अच्छा शिष्य मानते हैं। उनका कहना है, “वह सब कुछ व्यवस्थित रखता है – कपड़े, जूते, किट बैग। छोटी-छोटी चीजें ही बड़ा फर्क बनाती हैं।”

अब उनका अगला कदम और अधिक प्रतियोगिताओं में भाग लेना होना चाहिए। चक्रवर्ती मानते हैं, “यदि वह छह महीने में अधिक टूर्नामेंट खेले और वाइल्ड कार्ड मिले, तो शीर्ष 100 में जगह बनाना संभव है। अधिक टूर्नामेंट खेलना ही सफलता की कुंजी है।”