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काशी में यातायात क्रांति का शंखनाद

देश के पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट 'रोपवे' का सफल तकनीकी ट्रायल, ट्रैफिक जाम से मिलेगी स्थायी मुक्ति

विश्व की सबसे प्राचीन और जीवंत नगरी काशी (वाराणसी) आज अपने आध्यात्मिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखते हुए 21वीं सदी के आधुनिकतम बुनियादी ढांचे को अपना रही है। इसी कड़ी में वाराणसी ने भारत के शहरी परिवहन इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। देश के पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट रोपवे (Urban Public Transport Ropeway) का वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया के बीच सफल तकनीकी ट्रायल (Technical Trial) संपन्न कर लिया गया है। यह ट्रायल न केवल तकनीकी दृष्टिकोण से एक बड़ी सफलता है, बल्कि यह इस बात की भी घोषणा है कि बहुत जल्द काशी के निवासियों और देश-विदेश से आने वाले लाखों पर्यटकों को शहर के जानलेवा ट्रैफिक जाम से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी।

काशी की भौगोलिक जटिलता और ट्रैफिक का दुष्चक्र:
वाराणसी की गलियां और सड़कें ऐतिहासिक रूप से अत्यंत संकरी हैं। बाबा विश्वनाथ के दर्शन, गंगा आरती और शहर के घाटों का भ्रमण करने के लिए प्रतिदिन लाखों पर्यटक यहाँ आते हैं। रेलवे स्टेशन (कैंट) से श्री काशी विश्वनाथ मंदिर (गोदौलिया क्षेत्र) तक की दूरी वैसे तो मात्र 4 से 5 किलोमीटर है, लेकिन भयंकर ट्रैफिक जाम, संकरी सड़कों और ई-रिक्शा की भीड़ के कारण इस दूरी को तय करने में 45 मिनट से लेकर कभी-कभी एक घंटे से भी अधिक का समय लग जाता है। यह स्थिति न केवल पर्यटकों के लिए पीड़ादायक थी, बल्कि स्थानीय व्यापार और आपातकालीन सेवाओं (जैसे एम्बुलेंस) के लिए भी भारी मुसीबत बन गई थी।

क्या है काशी रोपवे परियोजना की रूपरेखा?
इस समस्या के स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल समाधान के रूप में ‘काशी रोपवे’ परियोजना की कल्पना की गई। यह परियोजना स्विट्जरलैंड की विश्वस्तरीय केबल कार तकनीक (Gondola Technology) पर आधारित है।
कैंट स्टेशन से लेकर गोदौलिया चौराहे तक लगभग 3.85 किलोमीटर लंबे इस रोपवे मार्ग पर कुल पांच स्टेशन बनाए गए हैं: कैंट रेलवे स्टेशन, विद्यापीठ, रथ यात्रा, गिरजाघर और गोदौलिया।
इस व्यवस्था के तहत हवा में उड़ते हुए ‘केबल कार’ (Gondola) के माध्यम से कैंट से गोदौलिया तक का सफर मात्र 15 से 16 मिनट में तय किया जा सकेगा। हर केबल कार में 10 यात्रियों के बैठने की आरामदायक व्यवस्था होगी और हर 2 से 3 मिनट में यात्रियों को एक नई ट्रॉली उपलब्ध होगी।

सफल तकनीकी ट्रायल और सुरक्षा मानक:
हाल ही में विदेशी इंजीनियरों और स्थानीय अधिकारियों की देखरेख में केबल और ट्रॉलियों का लोड टेस्टिंग (Load Testing) और तकनीकी ट्रायल किया गया। ट्रॉलियों में वजन रखकर उनकी गति, ब्रेकिंग सिस्टम, आपातकालीन बचाव प्रणाली (Emergency Rescue System) और बिजली गुल होने पर बैकअप व्यवस्था का सघन परीक्षण किया गया। ट्रायल के नतीजे पूर्णतः सफल रहे हैं। सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखते हुए यह सुनिश्चित किया गया है कि आंधी या खराब मौसम में भी यात्री पूरी तरह सुरक्षित रहें। अधिकारियों को उम्मीद है कि आवश्यक क्लीयरेंस मिलने के बाद अगले महीने से इसे आम जनता के लिए व्यावसायिक रूप से खोल दिया जाएगा।

पर्यटन और पर्यावरण को अभूतपूर्व लाभ:
काशी रोपवे का सबसे बड़ा लाभ प्रदूषण नियंत्रण है। यह पूरी तरह से बिजली से चलने वाला ‘जीरो एमिशन’ (शून्य उत्सर्जन) परिवहन है, जो सड़क पर उतरने वाले हजारों पेट्रोल/डीजल वाहनों का धुआं कम करेगा। इसके अतिरिक्त, हवा में उड़ते हुए यात्रा करने से पर्यटकों को काशी की ऐतिहासिक छटा और गंगा के घाटों का जो विहंगम और नयनाभिराम दृश्य (Panoramic View) मिलेगा, वह अपने आप में एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण बन जाएगा।

वाराणसी का यह पब्लिक ट्रांसपोर्ट रोपवे केवल एक शहर की परिवहन परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत के उन सभी प्राचीन और घनी आबादी वाले शहरों के लिए एक आदर्श मॉडल (Role Model) है जो संकरी सड़कों और ट्रैफिक जाम से जूझ रहे हैं। यह रोपवे सिद्ध करता है कि शहर के ऐतिहासिक स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना भी, हवा के रास्ते यातायात की एक सुगम, तेज और सुरक्षित व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है। काशी की यह उड़ान भारत के शहरी परिवहन भविष्य की एक शानदार झांकी है।